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इटावा। उत्तर प्रदेश के इटावा जिले से एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जहाँ कंधेसीघार के घने जंगलों में लकड़ी माफियाओं ने वन विभाग की टीम पर ही तमंचा तान दिया। अवैध कटाई को रोकने पहुँचे डिप्टी रेंजर और वन रक्षक को माफियाओं ने पहले गालियाँ दीं, फिर मारपीट की, और आखिर में देसी पिस्तौल निकालकर जान से मारने की धमकी दे डाली। पुलिस ने चार नामजद समेत कुल 10 आरोपियों के खिलाफ संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया है।
यह घटना मंगलवार (20 मई) सुबह करीब 8 बजे की है। वन रक्षक राहुल राजपूत ने पुलिस को दी अपनी तहरीर में बताया कि वे डिप्टी रेंजर सूर्यकांत शुक्ला के साथ रोजाना की तरह रूटीन गश्त पर थे। इसी दौरान रूरा गाँव के पास एक ऊँची जगह से उन्हें जंगल के भीतर पेड़ कटने की आवाज सुनाई दी। शक होने पर दोनों तुरंत आवाज की दिशा में बढ़ गए। जब वन विभाग की टीम मौके पर पहुँची, तो वहाँ पहले से ही कई लोग मौजूद थे और धड़ल्ले से सरकारी जंगल के हरे पेड़ों को आरा मशीन और कुल्हाड़ी से काटने में जुटे थे। आरोपियों में चिंदोली (लवेदी) निवासी पंचम उर्फ पंचू, सूरज, भूरे और मिहौली (बढ़पुरा) निवासी अंकित समेत कुल 10 लोग शामिल थे।
वनकर्मियों ने जैसे ही इन लोगों को अवैध कटाई से रोकने की कोशिश की, माफियाओं का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। देखते ही देखते पंचम और सूरज ने अपनी देसी पिस्तौल निकाल लीं और डिप्टी रेंजर सूर्यकांत शुक्ला व वन रक्षक राहुल राजपूत की छाती पर तान दीं। माफियाओं ने वनकर्मियों को साफ धमकी दी कि "अगर तुम लोग इस इलाके में दोबारा दिखे, तो देखते ही गोली मार देंगे।" घने और सुनसान जंगल में खुद को बुरी तरह घिरा और अकेला पाकर दोनों वनकर्मियों ने मजबूरन वहाँ से पीछे हटने का फैसला किया।
वन रक्षक राहुल राजपूत के अनुसार, माफियाओं ने जंगल में करीब 20 हरे पेड़ों को काटकर वन संपदा को भारी नुकसान पहुँचाया है। घटना के बाद आरोपी कटी हुई लकड़ी समेटकर फरार हो गए, लेकिन जल्दबाजी में वे अपनी बिना नंबर प्लेट वाली एक बाइक को वहीं छोड़ गए, जिसे पुलिस ने जब्त कर लिया है। इस मामले में थाना प्रभारी बलराम मिश्रा का कहना है कि वन विभाग की तहरीर के आधार पर चार नामजद (पंचम उर्फ पंचू, सूरज, भूरे और अंकित) समेत 10 लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है। पुलिस की अलग-अलग टीमें आरोपियों की धरपकड़ के लिए लगातार दबिश दे रही हैं और उम्मीद है कि जल्द ही सभी को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।
यह कोई पहली घटना नहीं है जब इटावा के जंगलों में लकड़ी माफियाओं ने इस तरह का साहस दिखाया हो। सवाल यह है कि आखिर जिला प्रशासन और वन विभाग का संयुक्त तंत्र इन माफियाओं पर अंकुश लगाने में नाकाम क्यों साबित हो रहा है? स्थानीय लोगों की मानें तो कंधेसीघार के जंगलों में पिछले कई महीनों से अवैध कटान का खुला खेल जारी है, लेकिन प्रशासन आँखें मूंदे बैठा है। अब जब वनकर्मियों पर ही तमंचा तान दिया गया, तो प्रशासन की सुस्ती पूरी तरह बेनकाब हो गई है।
वन विभाग के अधिकारियों से जब इस मामले में बात करने की कोशिश की गई, तो उनका कहना था कि "जंगल का क्षेत्र काफी बड़ा है और स्टाफ की भारी कमी है, जिसके चलते हर जगह एक साथ निगरानी कर पाना मुश्किल हो जाता है।" हालाँकि, इस तरह की दलीलें अब बासी हो चुकी हैं। जरूरत है तो एक ठोस रणनीति और सख्त कार्रवाई की, ताकि जंगल और वनकर्मी दोनों सुरक्षित रह सकें।
कंधेसीघार जंगल की यह घटना सिर्फ एक आपराधिक वारदात भर नहीं है, बल्कि यह सरकारी तंत्र की कमजोर होती पकड़ का भी सबूत है। जब कानून का पालन कराने वाले अफसर ही असुरक्षित महसूस करने लगें, तो समझा जाना चाहिए कि हालात कितने बदतर हो चुके हैं। अब देखने वाली बात होगी कि पुलिस आरोपियों को कितनी जल्दी सलाखों के पीछे पहुँचाती है और प्रशासन इस घटना से कोई सबक लेता है या नहीं।

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