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ग्राउंड रिपोर्ट

चित्रकूट का दोहरा चेहरा: रीलों में 'विकासशील', हकीकत में सिस्टम से लड़ता गाँव

| Chitrakoot, Uttar Pradesh | May 08, 2026, 11:53 AM IST WhatsApp
चित्रकूट का दोहरा चेहरा: रीलों में 'विकासशील', हकीकत में सिस्टम से लड़ता गाँव

चित्रकूट। ज़रा अपने फ़ोन का फ़ेसबुक या एक्स (X) खोलिए और चित्रकूट के ज़िलाधिकारी पुलकित गर्ग के आधिकारिक हैंडल पर जाइए। आपको रोज़ाना रील, फ़ोटो और वीडियो मिल जाएँगे — "सीएम के निर्देश पर शिलान्यास", "डिजिटल जनगणना का शुभारंभ", "जल जीवन मिशन से बदलती तस्वीर।" इन्फ़्लुएंसर सम्मानित हो रहे हैं, उन्हें आईडी कार्ड दिए जा रहे हैं ताकि वे चित्रकूट की 'विकास गाथा' को देश-दुनिया तक पहुँचाएँ।

लेकिन दूसरी तरफ़, जब आप चित्रकूट के पाठा, मऊ या राजापुर इलाके की धूल भरी सड़कों पर पाँव रखते हैं, तो इन रीलों की चमक फीकी पड़ जाती है और सामने आती है एक ऐसी हक़ीकत जो आँखें नम कर दे। चित्रकूट इस वक़्त "दो चेहरों वाले शहर" की सबसे सटीक मिसाल बन चुका है। एक चेहरा सोशल मीडिया की चकाचौंध के लिए है, और दूसरा आम ग्रामीण की ज़िंदगी से जुड़ा, जो आज भी पानी-सड़क-बिजली जैसी बुनियादी चीज़ों के लिए भटक रहा है।

जब कैमरे के लिए जल जीवन मिशन 'सफल' हुआ, लेकिन गाँव प्यासा रहा

केंद्र और राज्य सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजना 'हर घर नल से जल' को ही ले लीजिए। आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल और यूट्यूब चैनलों पर दावा किया जाता है कि चित्रकूट में इस योजना ने कमाल कर दिया और यह पूरे देश के लिए मिसाल बन गया है।

लेकिन ज़रा मऊ तहसील के अहिरी गाँव में चलकर देखिए। यहाँ जल जीवन मिशन के तहत लगी पाइपलाइनें सिर्फ़ दिखाने के लिए हैं। पिछले कई महीनों से पानी की सप्लाई ठप है। गाँव के प्रधान रामचरण निषाद खुद कहते हैं, "ये योजना सिर्फ़ कागज़ों पर चल रही है, धरातल पर इसका कोई लाभ नहीं मिल रहा।" नतीजा यह है कि भीषण गर्मी में महिलाओं और बच्चों को टैंकर के पीछे कतार में लगना पड़ रहा है। अहिरी जैसे एक दर्जन से ज़्यादा गाँव इसी हाल में हैं।

ठीक ऐसा ही हाल गढ़चपा गाँव का है, जहाँ 2016-17 में बनी पेयजल योजना के सात नलकूपों की मशीनें जवाब दे चुकी हैं और आठ मजरों तक पानी की एक बूँद नहीं पहुँच पा रही। जब एडीएम ने मौके पर जाकर जाँच की, तब कहीं जाकर मरम्मत के निर्देश दिए गए — लेकिन तब तक हजारों लोगों की गर्मी पानी के बिना कट चुकी थी।

जहाँ डकैत तो चले गए, लेकिन विकास नहीं आया

चित्रकूट के पाठा क्षेत्र की कहानी तो और भी दर्दनाक है। यह इलाका कभी डकैतों के आतंक के लिए बदनाम था। डकैतों के डर से यहाँ विकास कार्य नहीं होते थे — यह कहकर हर बार अधिकारी पल्ला झाड़ लेते थे। लेकिन अब पाठा से डकैत लगभग ख़त्म हो चुके हैं। सवाल यह उठता है कि अब तो विकास की राह में कोई रोड़ा नहीं है, फिर भी हालात क्यों नहीं बदले?

हाल ही में जब एक न्यूज़ चैनल की टीम बगदरी ग्राम पंचायत पहुँची, तो वहाँ की तस्वीरें सोशल मीडिया की चमक-दमक से बिल्कुल उलट थीं। गाँव की नालियाँ गंदगी से पटी पड़ी थीं, जगह-जगह बदबू और बीमारी का ख़तरा मँडरा रहा था। सड़कों के किनारे बहता गंदा पानी स्वच्छता की उस व्यवस्था की पोल खोल रहा था, जिसकी चमकदार तस्वीरें रोज़ाना सोशल मीडिया पर डाली जा रही थीं।

सोशल मीडिया सेल: जहाँ 'हाँ में हाँ' मिलाने वालों की चलती है

चित्रकूट में अब सोशल मीडिया महज़ प्रचार का ज़रिया नहीं रह गया है, बल्कि सत्ता की पहुँच और नौकरशाही की PR मशीन बन चुका है। डीएम ऑफ़िस ने एक "सोशल मीडिया सेल" बना रखी है, जहाँ से दिन-रात योजनाओं के प्रचार-प्रसार का काम होता है। सरकार की डिजिटल मीडिया पॉलिसी के तहत यहाँ चुनिंदा इन्फ़्लुएंसर्स को सम्मानित कर उन्हें प्रशासन का हिस्सा बना दिया गया है।

लेकिन स्थानीय लोगों की शिकायत है कि यह सोशल मीडिया सेल और इससे जुड़े अफ़सर ज़मीन की सच्चाई देखना ही नहीं चाहते। एक फ़ेसबुक पोस्ट में साफ़ लिखा गया कि "सीडीओ मैडम को जनपद में हो रहा भ्रष्टाचार नहीं दिखाई देगा, क्योंकि इनका मक़सद प्रदेश सरकार की हाँ में हाँ मिलाकर जल्दी से ज़िलाधिकारी बनना है।"

यह स्थिति बताती है कि प्रशासन के लिए असली विकास करने से ज़्यादा ज़रूरी विकास की तस्वीरें खींचना हो गया है।

कैमरे के लिए बनती हैं सड़कें, किसान की फ़सल नहीं

चित्रकूट में खेत तालाब योजना जैसी परियोजनाओं का हाल भी कुछ ऐसा ही है। 2021-22 में इस योजना के तहत करोड़ों रुपए का बंदरबाँट हुआ। दर्जनों किसानों के खेतों में तालाब सिर्फ़ कागज़ों में खुदे, ज़मीन पर नहीं। यह ठीक वैसा ही है जैसे नेता जी किसी फ़ीते को काटकर सड़क का उद्घाटन कर दें और वह सड़क पहली बारिश में बह जाए।

75 साल बाद भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित कुसमूही गाँव

राजापुर तहसील के कुसमूही गाँव की हकीकत सोशल मीडिया की उस चमक-दमक पर तमाचा है, जो दिखाती है कि चित्रकूट 'विकासशील' हो रहा है। यहाँ न पीने के लिए साफ़ पानी है, न बिजली की व्यवस्था है। लोग टॉर्च के सहारे घरों में उजाला करते हैं और कुएँ का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं।

आज़ादी के 75 साल बाद भी जब किसी गाँव में पानी और बिजली न पहुँची हो, और उसी ज़िले का प्रशासन सोशल मीडिया पर विकास की रील बना रहा हो — तो समझिए कि प्राथमिकताएँ कितनी ग़लत हो चुकी हैं।

दिखावे की इस फ़ैक्ट्री का अंत कब?

चित्रकूट का यह मामला कोई इकलौती घटना नहीं है, बल्कि आज के दौर की उस सोच का नतीजा है जिसमें 'सोशल मीडिया इम्प्रैशन' को 'ज़मीनी विकास' से ज़्यादा अहमियत दी जाने लगी है। यहाँ अधिकारियों की परख इस बात से नहीं होती कि उन्होंने कितनी समस्याओं का हल किया, बल्कि इस बात से होती है कि उन्होंने कितनी बार ख़ुद को कैमरे के सामने 'ऐक्शन मोड' में दिखाया।

याद रखिए, जब तक अस्पतालों में दवा की जगह फ़ोटो खिंचवाने का सिलसिला चलता रहेगा, स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई से ज़्यादा मिड-डे मील की सेल्फ़ी अहम रहेगी, और गाँव में पानी पहुँचाने की जगह पाइपलाइन के साथ खड़े होकर बनाई गई रील को तवज्जो मिलती रहेगी — तब तक 'डिजिटल चित्रकूट' का चेहरा भले ही चमकता रहे, लेकिन असली चित्रकूट अंधेरे में ही रहेगा।


? आपकी राय ही इस डिजिटल बहस की असली ताकत है!

इस लेख को पढ़ने के बाद आपके मन में जो भी आया — गुस्सा, सहमति, या आपके अपने गाँव-शहर का कोई किस्सा — वो नीचे कमेंट करके ज़रूर बताइए।

हो सकता है आपका एक कमेंट ही किसी बड़े बदलाव की चिंगारी बन जाए।

SK NISHAD

Founder & Editor-in-Chief Uttar Pradesh , Chitrakoot
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My name is SK Nishad, the Founder of Dainik Dhamaka Patrika, a digital news platform dedicated to delivering accurate, reliable, and impactful news to the public. I am committed to responsible journalism and strive to highlight important issues with honesty, transparency, and integrity.
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