उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में बसा चित्रकूट। जिसका नाम सुनते ही मन में प्रभु श्रीराम के वनवास काल की तपोभूमि और संतों-महात्माओं की पावन नगरी की छवि उभरती है। हर साल लाखों श्रद्धालु मंदिरों के दर्शन और आस्था की डुबकी लगाने यहाँ आते हैं। लेकिन इसी आस्था की नगरी का एक बिल्कुल अलग चेहरा भी है। एक ऐसा चेहरा जिसके बारे में पर्यटक ब्रोशर नहीं बताते, जिसे कोई ट्रैवल ब्लॉगर दिखाना पसंद नहीं करता। वो चेहरा है – पिछड़ेपन, जातिवाद, शोषण, भ्रष्टाचार और उपेक्षा का।
चित्रकूट जिला 4 सितंबर 1998 को अस्तित्व में आया। 3,164 वर्ग किलोमीटर में फैले इस जिले की आबादी 2011 की जनगणना में लगभग 9.91 लाख थी। लेकिन सरकारी आंकड़ों की चमक-दमक से इतर, चित्रकूट की असली पहचान यह है कि यह देश के 250 सबसे पिछड़े जिलों में से एक है। बुंदेलखंड का यह हिस्सा न सिर्फ विकास की मुख्यधारा से कटा है, बल्कि सदियों पुरानी सामंती मानसिकता, जातिगत बंधनों और संसाधनों के अभाव में जकड़ा हुआ है।
यहाँ दो चित्रकूट हैं। एक, जहाँ रामघाट पर दीपक जलते हैं और भजन गूंजते हैं। दूसरा, जहाँ गरीब, मजदुर, आदिवासी और दलित परिवार सदियों के सामंती उत्पीड़न के तले दबे कराह रहे हैं।
जाति का जहर: दिखता छुपता तंत्र और खुलेआम अपराध
1. सरकारी पदों पर 'पेपर पर जाति, ज़मीन पर दलित'
यह चित्रकूट की सबसे चौंकाने वाली सामाजिक बीमारियों में से एक है। "पेपर पर प्रजापति, असल में दलित" – यह एक ऐसी घिनौनी प्रथा है जिसने सरकारी नौकरियों के आरक्षण को मज़ाक बना दिया है। चित्रकूट के रामनगर ब्लॉक के गाँवों में पता चला कि ऊपरी जाति के लोग (जो पेपर पर पद पर हैं) अपना गंदा काम दलितों और आदिवासियों से करवाते हैं। 22,000 रुपये महीने का वेतन खुद रखते हैं, और गंदगी साफ करने या दूसरे 'गंदे' कामों के लिए दलितों को मात्र 200-300 रुपये प्रति दिन पर रखते हैं।
स्कूल के प्रधानाचार्य तक इस दोहरे खेल में संलिप्त हैं। दलित छात्रों को स्कूल के झाड़ू लगाने और टॉयलेट साफ करने के लिए पहले से बुलाया जाता था। यहाँ सरकारी योजनाओं का पैसा ऊपरी जातियों की जेब में जाता है और काम करते हैं दलित, लेकिन उन्हें उसकी कीमत नहीं मिलती। यह चोरी और भेदभाव का एक बहुत बड़ा तंत्र है, जो खुलेआम चल रहा है।
2. 'छुआछूत' के डर से पीटी गई चार साल की मासूम
यह कोई पुरानी कहानी नहीं है। साल 2023 में चित्रकूट के मानिकपुर कोतवाली इलाके के रामपुर कल्यानगढ़ गांव में एक चार साल की आदिवासी बच्ची ने गलती से एक उच्च वर्ग की महिला का पानी का घड़ा छू लिया था। इतना सा अपराध। बस इसी की सजा में उस बच्ची को बेरहमी से पीटा गया। जब उसके परिवार ने विरोध किया तो उन्हें भी लाठियों से पीटा गया। और अगर आपको लगता है कि पुलिस ने तत्परता दिखाई, तो गलत हैं। पुलिस ने इसे मामूली "जल भराव का विवाद" करार दिया। छुआछूत की यह विकृत मानसिकता आज भी जिंदा है। चार साल के मासूम का अपराध था कि उसने एक घड़ा छू लिया। क्या किसी इंसान को उसकी जाति के कारण इस तरह प्रताड़ित करना कोई सामान्य बात है?
3. बदनाम पुलिस और बेबस दलित लड़कियां
साल 2026 का हैरान करने वाला मामला: चित्रकूट में एक 17 वर्षीय दलित किशोरी ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। इससे पहले, होली के दिन उसके साथ तीन युवकों ने सामूहिक दुष्कर्म किया था। जब पीड़िता और उसके परिवार ने पुलिस से मदद मांगी, तो पुलिस ने उसे "होली पर रंग लगाने का मामूली झगड़ा" बताकर टाल दिया। पीड़िता ने आत्महत्या कर ली, तब कहीं जाकर पुलिस हरकत में आई और मामला दर्ज किया। यह घटना अकेली नहीं है। पहले भी एक नाबालिग दलित किशोरी के साथ दुष्कर्म हुआ, लेकिन पुलिस ने उसकी भी अनदेखी की थी।
4. जब एक बुजुर्ग महिला को चोर समझकर पीट-पीटकर मार डाला गया
2025 में चित्रकूट से एक ऐसी हैरान करने वाली खबर आई, जिसने इंसानियत को शर्मिंदा कर दिया। एक बुजुर्ग महिला गलती से दूसरे गांव जा पहुंची। गांव वालों ने उसे चोर समझ लिया और इतनी बेरहमी से पीटा कि उसकी मौत हो गई। यह घटना दर्शाती है कि इन ग्रामीण इलाकों में मानवीय संवेदना और कानून का शासन किस हद तक कोलैप्स हो चुका है।
आदिवासी बसेरों पर मंडराती मौत (कोल जनजाति का शोषण)
चित्रकूट में लगभग 40,000 कोल आदिवासी सरकारी जंगलों से बेदखली के डर के साये में जी रहे हैं। लेकिन बेदखली का डर तो एक पहलू है। असली दास्तां तो 'डाडू' कहे जाने वाले सामंतों के शोषण की है। कोल आदिवासी पीढ़ियों से जिन ज़मीनों पर खेती करते आ रहे थे, उन पर उनका कोई कानूनी हक नहीं था। स्थानीय ऊपरी जाति के सामंतों ने धोखे से उनकी जमीनें हड़प लीं, और उन्हें अपने यहाँ बंधुआ मजदूर बना लिया।
दफई (करवी ब्लॉक) के 80 से अधिक कोल परिवार इस सामंती शोषण की जिंदा मिसाल हैं। इनके पास न ज़मीन है, न ही राशन कार्ड। यहाँ 90 फीसदी बच्चे स्कूल नहीं जाते थे। महिलाओं को जंगलों में शौच जाना पड़ता था। पत्थर तोड़ने वाली फैक्ट्रियों में काम करने वाली आदिवासी महिलाओं के साथ यौन शोषण तक की घटनाएँ हुईं, और जब कार्यकर्ताओं ने आवाज उठाई तो पुलिस ने उन पर ही केस दर्ज कर दिए।
सरकारी योजनाओं की खोखली सच्चाई
चित्रकूट की सड़कों पर आपको सरकारी योजनाओं के बोर्ड तो दिख जाएंगे, लेकिन उनका जमीनी हकीकत कुछ और ही है।
- कांशीराम आवास योजना का घोटाला – 22 करोड़ रुपये से बनी 336 आवासों की कॉलोनी खंडहर में तब्दील हो रही है। बिजली और पानी की व्यवस्था न होने से अब तक इनका आवंटन भी नहीं हो पाया। यहाँ सुरक्षा तक नहीं है, दरवाजे और खिड़कियाँ तक गायब हैं।
- पेपर पर 'सिंचाई योजनाएं', असल में रेत – रसीन बांध परियोजना का नाम लीजिए। इस परियोजना ने 3,625 किसानों के लिए सिंचाई का वादा किया, लेकिन सच तो यह है कि इस बांध के निर्माण में सैकड़ों किसानों की ज़मीनें जबरन अधिग्रहित कर ली गईं। उन्हें भरपाई के तौर पर महज 90,000 रुपये दिए गए। आज वे बेघर और मजदूर बनकर रह गए हैं।
भ्रष्टाचार: एक प्रणालीगत बीमारी
हर सरकारी योजना के साथ एक बड़ा भ्रष्टाचार का तंत्र चित्रकूट में सक्रिय है। चाहे वो U-18 नेशनल सीनियर हॉकी कैंप में छत्तीसगढ़ के खिलाड़ी ओम यादव का चयन हो, या फिर कोई सड़क निर्माण। ठेकेदारों का एक खास तबका, राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ मिलकर, विकास का पैसा हड़प लेता है। मानिकपुर के 336 कांशीराम मकान इस बात की जीती जागती मिसाल हैं कि कैसे सरकारी धन का अपव्यय बिना किसी जवाबदेही के होता है। ये योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं, जमीन पर कुछ नहीं। सवाल उठता है – आखिरकार यह सब क्यों?
आखिरी सवाल: क्या यही है असली चित्रकूट?
कोई पूछता है तो हमें गर्व से चित्रकूट का नाम बताते हैं। लेकिन भाई, क्या यही वो चित्रकूट है जिस पर हमें गर्व करना चाहिए? जहाँ एक तरफ हम मंदिरों में लड्डू-प्रसाद चढ़ाते हैं, वहीं हमारी गलियों में जातिवाद का जहर पीकर हजारों बच्चे मर रहे हैं। हम पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए तो सड़कें बनाते हैं, लेकिन दलित बस्तियों में आज भी पक्की सड़कें दूर, पीने के पानी की व्यवस्था तक नहीं है।
अगर सच में हम चित्रकूट को विकसित करना चाहते हैं, तो इस विकास की परिभाषा बदलनी होगी। हरियाली और मंदिर-मस्जिद नहीं, बल्कि हर इंसान के बेसिक अधिकार – रोटी, कपड़ा, मकान, साफ पानी और सम्मान – यही असली विकास है।
चित्रकूट का सिर्फ एक चेहरा ही काफी नहीं है। दूसरा चेहरा न जाने कब तक छिपा रहेगा? यह वो सच्चाई है जो किसी पुस्तिकाओं में नहीं लिखी, किसी होर्डिंग पर नहीं चमकती। मगर यह सच है। और इस सच से आंखें चुराने का कोई फायदा नहीं है।
नोट : यह लेख चित्रकूट की वास्तविक सामाजिक ग्राउंड रियलिटी पर आधारित है, जिसमें विभिन्न मीडिया रिपोर्टों, प्रशासनिक दस्तावेजों, सामाजिक संस्थाओं की स्टडी और कोर्ट केस के रिकॉर्ड का उपयोग किया गया है। लेख का उद्देश्य केवल चित्रकूट के जमीनी हालात को उजागर करना है, न कि किसी विशेष जाति या समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाना।




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