दस साल पहले, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने इतिहास में एक ऐतिहासिक कदम उठाया था। सर्वसम्मति से प्रस्ताव 2286 पारित किया गया था – जिसका उद्देश्य था युद्ध के मैदान में अस्पतालों, डॉक्टरों, नर्सों और एम्बुलेंसों की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
लेकिन आज, उस प्रस्ताव की 10वीं वर्षगांठ पर, तीन दिग्गज अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं – ICRC (रेड क्रॉस), WHO और MSF (डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स) – के प्रमुखों ने साफ शब्दों में कहा है:
"हम कोई उपलब्धि नहीं मना रहे। हम एक विफलता को चिह्नित कर रहे हैं।"
क्योंकि सच्चाई यह है कि दस साल पहले जिस बुराई को रोकने की कोशिश की गई थी, वह न केवल जारी है, बल्कि कई जगहों पर और भी भयानक हो गई है। अस्पताल ढह रहे हैं, एम्बुलेंसें रुक रही हैं, डॉक्टर और मरीज़ गोलियों की चपेट में आ रहे हैं।
? मानवता का संकट – जब अस्पताल नहीं रहे सुरक्षित
यह सिर्फ एक रिपोर्ट नहीं है, यह उन लोगों की जीती-जागती गवाही है जो हर रोज दुनिया के सबसे खतरनाक इलाकों में काम कर रहे हैं। ICRC, WHO और MSF की टीमें जहाँ भी जाती हैं, वहाँ वे देखती हैं:
अस्पताल मलबे में तब्दील – बमबारी में पूरे स्वास्थ्य केंद्र नष्ट हो जाते हैं।
एम्बुलेंसों को रोका जाना – घायलों को ले जाने वाली गाड़ियों को चेकपॉइंट्स पर घंटों रखा जाता है, कई बार निशाना बनाया जाता है।
डॉक्टर और नर्स खुद शिकार – उन पर हमले होते हैं, उन्हें अपहरण किया जाता है, यहाँ तक कि ड्यूटी के दौरान मार दिया जाता है।
मरीज़ बिना इलाज मर रहे – वे घाव जिनका इलाज संभव है, अस्पताल न पहुँच पाने के कारण जानलेवा बन जाते हैं।
संस्थाओं ने चेतावनी दी है – जब अस्पताल और उनमें काम करने वाले लोग असुरक्षित हो जाते हैं, तो यह युद्ध के नियमों के टूटने का सबसे साफ संकेत है। यह सिर्फ मानवीय संकट नहीं, मानवता का संकट है।
? क्या है UNSC प्रस्ताव 2286?
3 मई 2016 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने यह ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया था। इसमें साफ कहा गया था:
सशस्त्र संघर्षों के सभी पक्षों को अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करना होगा।
चिकित्सा कर्मियों, एम्बुलेंसों, अस्पतालों और अन्य स्वास्थ्य सुविधाओं का सम्मान और संरक्षण किया जाना चाहिए।
स्वास्थ्य सुविधाओं पर हमले युद्ध अपराध हो सकते हैं।
लेकिन आज, 10 साल बाद, ICRC, WHO और MSF के प्रमुख एक स्वर में कह रहे हैं कि यह प्रस्ताव असफल रहा है – कानून की वजह से नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण।
? तीन बड़ी संस्थाओं का संयुक्त आह्वान
ICRC की प्रमुख मिर्जाना स्पोल्जरिक, WHO के प्रमुख डॉ. टेड्रोस अदनॉम घेब्रेयसस और MSF के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष ने एक संयुक्त बयान में तत्काल कार्रवाई की मांग की है।
उन्होंने सभी देशों से 7 ठोस कदम उठाने का आग्रह किया है:
प्रतिबद्धताओं को ठोस कार्रवाई में बदलें – बस कागजों पर कानून काफी नहीं।
सेना और सुरक्षा बलों के नियमों में सुरक्षा को शामिल करें – हर सैनिक को पता हो कि अस्पताल सुरक्षित हैं।
घरेलू कानूनों को मजबूत करें – स्वास्थ्य सुविधाओं पर हमला करने वालों को कड़ी सजा हो।
पर्याप्त संसाधन दें – पैसा, तकनीक और लोग – यह सब चाहिए इस सुरक्षा के लिए।
दूसरे पक्षों को प्रभावित करें – जिन देशों या समूहों को राज्य समर्थन देते हैं, उन्हें भी कानून मानने को कहें।
निष्पक्ष और पारदर्शी जांच करें – हर हमले की त्वरित और ईमानदार जांच हो।
नियमित रिपोर्टिंग करें – हर देश बताए कि वे क्या कर रहे हैं और कहाँ असफल हो रहे हैं।
⚖️ WHO की पुरानी पहल – प्रस्ताव 65.20
बयान में विश्व स्वास्थ्य सभा के प्रस्ताव 65.20 (2012) को भी याद किया गया। इसी प्रस्ताव के तहत WHO ने स्वास्थ्य सुविधाओं पर हमलों का व्यवस्थित दस्तावेज़ीकरण और रिपोर्टिंग शुरू की थी। इसे और मजबूत करने की आवश्यकता है – ताकि सबूतों के आधार पर रोकथाम की जा सके और दोषियों को जवाबदेह ठहराया जा सके।
? एक पत्रकार की नज़र से
देखिए भाई, यह कोई छोटी बात नहीं है। ICRC, WHO और MSF – ये तीन ऐसी संस्थाएँ हैं जो दुनिया के सबसे खतरनाक युद्ध क्षेत्रों में अपनी जान की बाजी लगाकर काम करती हैं। जब ये तीनों एक साथ खड़े होकर कहें कि "हालात दस साल पहले से भी बदतर हैं" – तो यह चेतावनी है।
गाजा, यूक्रेन, सूडान, सीरिया, यमन, अफगानिस्तान – हर जगह अस्पताल ढह रहे हैं। डॉक्टर मर रहे हैं। मरीज़ बिना इलाज मर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र का सबसे शक्तिशाली निकाय – सुरक्षा परिषद – का प्रस्ताव भी उनकी रक्षा नहीं कर पा रहा।
सवाल यह है – क्या दुनिया के नेता सुनेंगे? क्या वे राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाएंगे?
क्योंकि जब तक वे नहीं दिखाएंगे, ये हमले जारी रहेंगे। और हर बार एक निर्दोष डॉक्टर या मरीज़ की मौत के साथ, हम मानवता का एक और टुकड़ा खो देंगे।
"स्वास्थ्य देखभाल को कभी युद्ध का शिकार नहीं बनना चाहिए।"
यह कोई नारा नहीं, एक अनिवार्यता है।




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