दिल्ली । दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने बड़ा दावा किया है। संगठन की ताजा रिजल्ट्स रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में करीब 56.7 करोड़ लोगों तक ज़रूरी स्वास्थ्य सेवाएं पहुंची हैं, वो भी बिना इसके कि उन्हें मुंहमांगा खर्च करना पड़ा। यानी WHO के मुताबिक, गरीब से गरीब इंसान भी अस्पताल या दवाई के बोझ से डूबा नहीं।
लेकिन रिपोर्ट की असली तस्वीर आधी-अधूरी है। WHO ने खुद माना है कि उसके करीब आधे आउटपुट इंडिकेटर यानी लक्ष्य अधूरे रह गए। खासतौर पर उन इलाकों में, जहां या तो अकाल जैसी स्थिति है या फिर जहां फंडिंग सूख गई है।
तीन बड़े लक्ष्य, तीन बड़े आंकड़े
WHO ने अपने तेरहवें आम कार्यक्रम (GPW13) के तहत तीन 'ट्रिपल बिलियन' लक्ष्य रखे थे। रिपोर्ट बताती है:
- 56.7 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्हें बिना कंगाल बनाए स्वास्थ्य सुविधाएं मिलीं। यानी 2018 के मुकाबले 13.6 करोड़ लोगों का इज़ाफा सिर्फ पिछले एक साल में हुआ।
- 69.8 करोड़ लोग अब स्वास्थ्य आपात स्थितियों से बेहतर तरीके से सुरक्षित हैं। इनमें से 6.1 करोड़ लोग अकेले 2024 के बाद जुड़े।
- 175 करोड़ लोग पहले से अधिक स्वस्थ जीवन जी रहे हैं। यानी 2024 के मुकाबले 30 करोड़ लोगों की सेहत में सुधार हुआ।
सुनने में ये आंकड़े बड़े अच्छे लगते हैं। पर WHO खुद कहता है कि ये रफ्तार काफी नहीं है। 2030 तक तय किए गए स्वास्थ्य लक्ष्य (SDG) से दुनिया अब भी बहुत पीछे है।
असली समस्या: पैसा, लोग और प्राथमिकताएँ
रिपोर्ट में साफ लिखा है कि WHO के कामकाज पर फंडिंग कटौती का गहरा असर पड़ा है। जहाँ पहले ज़्यादा स्वास्थ्य कर्मी थे, वहाँ अब कम हो गए। जहाँ तकनीकी मदद मिलती थी, वहाँ वो सीमित हो गई। कई प्रोग्राम धीमे पड़ गए।
सबसे बड़ी चुनौती ये है कि WHO को मिलने वाला अधिकतर पैसा पहले से तय कर दिया जाता है कि वो किस खास बीमारी या खास क्षेत्र में जाएगा। मतलब, संगठन अपनी मर्ज़ी से ये नहीं तय कर सकता कि सबसे ज़्यादा ज़रूरत कहाँ है। रिपोर्ट के मुताबिक, ये एक बहुत बड़ी रुकावट है।
ये पाँच कामयाबियाँ WHO ने खुद गिनाईं
हालाँकि WHO कोई खाली हाथ नहीं है। उसने 2025 में कुछ ऐसे काम किए, जिन्होंने दुनिया भर में असर डाला:
पहला – मानसिक स्वास्थ्य। आपात स्थितियों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच 28 फीसदी से बढ़कर 48 फीसदी तक पहुँच गई। यानी हर दूसरे मुश्किल इलाके में लोगों को मानसिक सहारा मिलने लगा है।
दूसरा – HPV टीकाकरण। सर्वाइकल कैंसर से बचाने वाला ये टीका अब पहले से कहीं ज़्यादा लोगों तक पहुँच रहा है। सिर्फ एक खुराक वाली व्यवस्था ने कवरेज को 2019 के 17 फीसदी से बढ़ाकर 2024 में 31 फीसदी कर दिया।
तीसरा – महामारी समझौता और IHR संशोधन। WHO ने भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए ऐतिहासिक पैंडेमिक एग्रीमेंट और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य नियमों (IHR) में बदलाव करवाए। अब दुनिया कोरोना जैसे झटके के लिए पहले से कुछ हद तक तैयार है।
चौथा – गाजा और अन्य आपदाएँ। 88 देशों में 66 आपात स्थितियों में WHO ने तुरंत काम किया। अकेले गाजा में 3.3 करोड़ (33 मिलियन) मेडिकल परामर्श दिए गए।
पाँचवाँ – वायु प्रदूषण से लड़ाई। WHO ने 2040 तक खराब हवा से होने वाली मौतों को आधा करने का रोडमैप जारी किया।
डॉ. टेड्रोस ने क्या कहा?
WHO प्रमुख डॉ. टेड्रोस अदनॉम घेब्रेयसस बिल्कुल साफ शब्दों में कहते हैं:
"रिजल्ट्स रिपोर्ट 2025 ये साबित करती है कि WHO और उसके भागीदारों के साथ मिलकर देश लाखों लोगों को ठोस फायदा पहुँचा सकते हैं। लेकिन ये फायदे हमेशा के लिए नहीं हैं। इन्हें बचाने और बढ़ाने के लिए लगातार समर्थन और निवेश चाहिए। स्वास्थ्य हर इंसान का अधिकार है, एहसान नहीं।"
बात बड़ी साफ है। WHO ने काम किया है, लेकिन फंडिंग के ताले पर वो ताली नहीं बजा सकता।
अब क्या होगा?
अगली बड़ी तारीख है 18-23 मई 2026। उस हफ्ते जिनेवा में 79वीं विश्व स्वास्थ्य सभा बुलाई गई है। वहाँ WHO अपनी ये रिजल्ट्स रिपोर्ट सदस्य देशों के सामने रखेगा। तय होगा कि आने वाले सालों में WHO को कितना पैसा मिलेगा, कितनी आज़ादी मिलेगी और किन मोर्चों पर लड़ना है।
रिपोर्ट का एक वाक्य बहुत याद रखने लायक है:
"WHO का अधिकतर फंडिंग अब भी उधेड़-बुन कर आता है, जिससे असली ज़रूरतों पर खर्च करना मुश्किल हो जाता है।"
अगर दुनिया चाहती है कि 2030 तक हर गरीब को दवा और अस्पताल मिले, तो ये फंडिंग पैटर्न बदलना पड़ेगा। वरना आंकड़े बढ़ेंगे, लेकिन जमीनी असर वही रहेगा।
देखिए भाई, WHO की ये रिपोर्ट दो मुंह वाली तलवार है। एक तरफ WHO ये दिखाने की कोशिश कर रहा है कि "देखो, हमने फंडिंग कटौती के बावजूद 56 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाईं।" दूसरी तरफ खुद कह रहा है कि "हमारे आधे प्रोजेक्ट अधूरे हैं, और पैसा इतना बंधा हुआ है कि सही जगह खर्च नहीं कर सकते।"
असली सवाल ये है कि WHO को ऐसी स्थिति में क्यों लाया गया? जब दुनिया ने कोरोना में देख लिया कि बिना मजबूत WHO के कितनी मुश्किल होती है, तो फिर उसी WHO का गला क्यों घोंटा जा रहा है?
इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद एक ही बात समझ में आती है – WHO से काम तो हो रहा है, लेकिन उसकी पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा। और जब तक देश उसे खुला हाथ और खुली छूट नहीं देंगे, तब तक ये अधूरे लक्ष्यों का सिलसिला चलता रहेगा।




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