3 वर्ष 7 माह 25 दिन की ऐतिहासिक पदयात्रा पूरी कर गृह जनपद पहुंचे रोविंग सनोज़, जनपदवासियों ने किया भव्य स्वागत
3 वर्ष 7 माह 25 दिन की ऐतिहासिक पदयात्रा पूरी कर गृह जनपद पहुंचे रोविंग सनोज़, जनपदवासियों ने किया भव्य स्वागत
कुशीनगर कहते हैं कि अगर किसी ने ठान लिया तो उसे कोई रोक नहीं सकता। ऐसा ही कुछ कर दिखाया है कुशीनगर के इस नौजवान ने। नाम है रोविंग सनोज़। ये वो शख्स है जिसने करीब साढ़े तीन साल तक लगातार पैदल चलकर पूरे भारत का सफर तय किया। हाँ, पूरा भारत। पहाड़ हो, रेगिस्तान हो, बारिश हो या धूप – बस चलता रहा।
आखिरकार, लगभग 3 साल, 7 महीने और 25 दिन के बाद रोविंग सनोज़ अपने गृह जनपद कुशीनगर में वापस लौटे हैं। लौटे तो ऐसे जैसे कोई योद्धा जीतकर आया हो। सड़कों पर लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। कोई फूल बरसा रहा था, कोई माला पहना रहा था। कई लोग तो रो पड़े।
जब सनोज़ अपने गाँव पहुँचे, तो सबसे पहले उनकी माँ ने उन्हें छाती से लगा लिया। बोली – "बेटा, तूने तो हम सबको दीवाना बना दिया था। न खबर, न ठिकाना। पर आज शुक्र है कि लौट आया।" वैसे तो सनोज़ सोशल
हमने जब सनोज़ से पूछा कि इतने दिनों तक पैदल चलना कैसा लगा, तो थोड़ी देर के लिए वह चुप हो गए। फिर बोले – "भाई, ईमानदारी से बताऊँ तो बहुत मुश्किल था। बिना पैसे के, बिना ठिकाने के, कभी मंदिर में सोना, कभी बस स्टैंड पर। रास्ते में कुत्तों ने भगाया, ठंड में हाथ-पैर जम गए, लू में चलना तो जैसे मौत से सटकर चलना था।"
उन्होंने बताया कि एक बार राजस्थान के रास्ते में तीन दिन तक पानी नहीं मिला। तब एक ढाबे वाले ने न सिर्फ पानी पिलाया, बल्कि दो दिन तक खाना भी खिलाया। सनोज़ कहते हैं – "भारत असल में सड़कों पर रहता है। यहाँ के लोगों के दिल बहुत बड़े हैं।"
रोविंग सनोज़ सिर्फ इसलिए नहीं चले थे कि कहीं घूम आएँ। उनका कहना है कि वह देश के लोगों को आपस में जोड़ने का संदेश देना चाहते थे। वह कहते हैं, "हम एक ही देश में रहते हैं, लेकिन पहाड़ का आदमी समुद्र के किनारे वाले को नहीं जानता। मैंने सोचा क्यों न पैदल चलकर सबको मिलूँ, उनकी बातें सुनूँ, उनकी मुश्किलें समझूँ।"
अपनी यात्रा के दौरान वह कश्मीर से कन्याकुमारी, गुजरात से अरुणाचल तक सब जगह गए। उन्होंने दर्जनों भाषाएँ सुनीं, सैकड़ों तरह के खाने खाए, और हर जगह लोगों ने उन्हें अपनाया।
जब हमने पूछा कि अब इतना लंबा सफर करने के बाद क्या करोगे, तो सनोज़ मुस्कुराए। बोले – "पहले तो दो महीने ज़मीन पर लोट-लोटकर सोऊँगा। फिर सोचूँगा। पर एक सोच है – एक किताब लिखूँ, इस सफर की, ताकि जो नहीं जा सकते, वो पढ़कर जैसे चले हुए महसूस करें।"
स्थानीय लोगों का कहना है कि रोविंग सनोज़ की इस यात्रा ने यह साबित कर दिया है कि पैसे और साधन न होने पर भी जुनून हो तो कुछ भी किया जा सकता है। एक युवा ने कहा – "भाई सनोज़ हम सबके लिए प्रेरणा हैं। हम तो सोच भी नहीं सकते, उन्होंने कर दिखाया।"
फिलहाल कुशीनगर में उत्सव जैसा माहौल है। लोग टोलियाँ बनाकर सनोज़ से मिलने उनके घर जा रहे हैं। कहते हैं कोई बधाई देने, तो कोई बस उन्हें एक बार छूने। और सनोज़? वह थोड़ा थके हैं, पर मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं – घर आखिर घर होता है।
अपनी राय व्यक्त करें (कमेंट्स)
पाठकों की प्रतिक्रियाएं
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। अपनी राय साझा करें!