कुशीनगर: 9 साल पुराने दहेज हत्या मामले में पति-सास को 10-10 साल की कैद, ऑपरेशन कन्विक्शन की सफलता
कुशीनगर: 9 साल पुराने दहेज हत्या मामले में पति-सास को 10-10 साल की कैद, ऑपरेशन कन्विक्शन की सफलता
कुशीनगर। दहेज के लिए बहू को मौत के घाट उतारने वाले पति और सास को कुशीनगर पुलिस ने नौ साल पुराने मामले में सलाखों के पीछे पहुँचा ही दिया। जिला एवं सत्र न्यायालय ने मंगलवार को दोनों दोषियों को 10-10 वर्ष के कठोर कारावास और 2,000-2,000 रुपये के अर्थदंड की सज़ा सुनाई। ऑपरेशन कन्विक्शन के तहत पुलिस की प्रभावी पैरवी ने एक बार फिर साबित किया कि फाइलें भले पुरानी पड़ जाएँ, लेकिन इंसाफ का दरवाज़ा कभी बंद नहीं होता।
मामला
थाना कोतवाली हाटा के दुंगा बाज़ार का है। वर्ष 2017 में मृतका के मायके
वालों की तहरीर पर मुकदमा संख्या 383/2017 में धारा 498ए, 304बी भादवि और
3/4 दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत केस दर्ज हुआ था। आरोप था कि नरेन्द्र
सिंह और उसकी माँ कोशिल्या देवी अतिरिक्त दहेज के लिए विवाहिता को
प्रताड़ित करते थे, जिसके बाद उसकी संदिग्ध हालत में मौत हो गई। पुलिस ने
विवेचना के बाद न्यायालय में चालान पेश किया। स्थानीय पुलिस, मॉनिटरिंग सेल
और अपर जिला शासकीय अधिवक्ता उपेन्द्र कुमार पाठक की जोड़ी ने एक-एक सबूत
और गवाही को इतनी मज़बूती से रखा कि अदालत ने दोनों को दोषी करार दे दिया।
कुशीनगर
पुलिस की इस सफलता की सराहना हर ओर हो रही है, लेकिन आम लोगों के मन में
कुछ स्वाभाविक प्रश्न भी हैं। 2017 में हुई इस वारदात को अदालत तक
पहुँचते-पहुँचते नौ साल क्यों लग गए? क्या त्वरित न्याय की व्यवस्था में यह
देरी सामान्य है? अर्थदंड की रकम पर है। दहेज हत्या जैसे जघन्य
अपराध में महज़ 2,000 रुपये का जुर्माना क्या वाकई न्याय की गरिमा से मेल
खाता है? क्या इससे अपराधियों पर कोई सख्त संदेश जाता है? जिस
मॉनिटरिंग सेल और प्रभावी पैरवी की बात हो रही है, क्या इसे अन्य लंबित
दहेज प्रकरणों में भी उसी तेज़ी से लागू किया जाएगा?
कार्रवाई
में थानाध्यक्ष संजय द्विवेदी, पैरोकार कांस्टेबल दुर्गेश यादव और पूरी
कानूनी टीम ने जो मेहनत की, उसकी प्रशासनिक हलकों में तारीफ है। ऑपरेशन
कन्विक्शन के नोडल अधिकारियों का कहना है कि पुराने गंभीर मामलों में इसी
तरह पैरवी करके दोषियों को सज़ा दिलाने का अभियान लगातार चलता रहेगा।
पीड़ित परिवार ने फैसले पर संतोष जताया है, हालाँकि वे चाहते थे कि सज़ा और
सख्त हो। आज की इस जीत ने एक बार फिर यह उम्मीद बँधाई है कि इंसाफ भले देर
से मिले, पर मिलता ज़रूर है—बशर्ते पुलिस और अभियोजन की जोड़ी ऐसे ही
ईमानदारी से पैरवी करती रहे।
न्याय की देरी और कमज़ोर जुर्माने की रकम पर बहस जारी रहेगी, लेकिन पति-सास को सलाखों के पीछे देखकर पीड़िता की आत्मा को शांति मिली होगी—यही इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
जिला समाचार
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