कुशीनगर। अगर कोई अकेला किसान अपनी ज़मीन का रकबा बढ़ाने की कोशिश करे, तो राजस्व की नाप-जोख तुरंत चालू हो जाती है। मगर ग्राम पंचायत बरवा पुर्दील में विकास कार्यों के नाम पर करोड़ों का सरकारी धन नाप-तोल बिना ही फूँक दिया गया—यह आरोप अब खुद जिला पंचायत राज अधिकारी तक पहुँच गया है। डीपीआरओ आलोक कुमार प्रियदर्शी ने तीन दिन के भीतर पूरा अभिलेख तलब कर लिया है, जिसके बाद प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है।
दरअसल, विकास खंड विशुनपुरा की ग्राम पंचायत बरवा पुर्दील निवासी रबिउल्लाह पुत्र इमामुद्दीन ने जिलाधिकारी को दिए शपथ पत्र में सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि नाली निर्माण, इंटरलॉकिंग, खड़ंजा, साफ-सफाई और स्ट्रीट लाइट जैसे तमाम कार्यों के भुगतान तो कर दिए गए, लेकिन वे ज़मीन पर पूरे नहीं उतरे। यानी, कागज़ों में गाँव चमका दिया गया, जबकि हकीकत की गलियाँ आज भी कीचड़ और अँधेरे में धँसी हैं।
जनता दर्शन में उठा मामला, फिर शुरू हुई कागज़ी दौड़
सूत्रों
के अनुसार, रबिउल्लाह ने पहले स्थानीय स्तर पर कई बार गुहार लगाई। जब
सुनवाई नहीं हुई, तो वे सीधे जनता दर्शन कार्यक्रम में जिलाधिकारी के सामने
शिकायत लेकर पहुँचे। डीएम ऑफिस ने संज्ञान लेते हुए फाइल जिला पंचायत राज
अधिकारी को भेज दी। डीपीआरओ ने मामले की गंभीरता को समझते हुए संबंधित
ग्राम प्रधान, ग्राम सचिव और खंड विकास अधिकारी को पत्र जारी कर तीन दिन के
भीतर नाली निर्माण, इंटरलॉकिंग, खड़ंजा, साफ-सफाई, स्ट्रीट लाइट और मनरेगा
से जुड़े समस्त व्यय-प्रमाण पत्र, मस्टर रोल और कार्य-स्थल फोटोग्राफ माँग
लिए हैं।
पत्र में साफ लिखा है—तीन दिन में अभिलेख नहीं आए, तो संबंधित अधिकारी-कर्मचारी खुद जिम्मेदार होंगे। इस सख्त निर्देश से साफ है कि प्रशासन को शिकायत में दम नजर आ रहा है।
कैसे पचता रहा पैसा—अकेला गाँव नहीं, पूरा सिस्टम कठघरे में
सवाल
सिर्फ बरवा पुर्दील तक सीमित नहीं है। अगर किसी एक ग्राम पंचायत में इस कदर
अनियमितता की आशंका है कि डीपीआरओ को सीधे रिकॉर्ड मँगाना पड़ा, तो आस-पास
की पंचायतों का हाल क्या होगा? बड़ा सवाल यह भी है कि जब कार्य पूर्ण नहीं
हुए, तो उनकी माप-पुस्तिका किसने पास की, और भुगतान की संस्तुति किस
अधिकारी ने की? यह पूरी जाँच अब सिर्फ कागजी खानापूर्ति तक सीमित नहीं रह
सकती।
रबिउल्लाह ने क्यों खोला मोर्चा?
गाँव
के ही रहने वाले शिकायतकर्ता ने हलफनामे में लिखवाया है कि कुछ वित्तीय
वर्षों के कार्यों का भुगतान तो हो गया, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी
बयान करती है। उन्होंने दोषियों पर सख्त कार्रवाई की माँग की है। स्थानीय
चर्चा है कि रबिउल्लाह ने पहले भी पंचायत के कामकाज पर सवाल उठाए थे, लेकिन
हर बार मामला 'सहमति' की आड़ में दबा दिया गया।
अब डीपीआरओ ने जाँच की जो कमान संभाली है, उसके बाद गाँव के लोगों की निगाहें तीन दिन की इस डेडलाइन पर टिक गई हैं। यदि दोषी पाए जाते हैं तो ग्राम प्रधान से लेकर तकनीकी स्वीकृति देने वाले अभियंताओं तक पर गाज गिरना तय है। फिलहाल, बरवा पुर्दील की खड़ंजा-नाली के सवाल ने पूरे कुशीनगर के विकास मॉडल को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
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