सरकारी स्कूल की छात्रा से SDM तक का सफर: कुशीनगर की बेटी सल्तानत प्रवीण बनीं लाखों युवाओं की प्रेरणा
सरकारी स्कूल की छात्रा से SDM तक का सफर: कुशीनगर की बेटी सल्तानत प्रवीण बनीं लाखों युवाओं की प्रेरणा
बात छोटी सी है, पर सुनने वाली है। कुशीनगर में एक बेटी है – सल्तानत प्रवीण। यूपीपीसीएस में छठी रैंक लाकर एसडीएम बनी। अब तक तो सब ठीक है। पर असल कहानी यहाँ से शुरू होती है, जब वह उसी सरकारी स्कूल के चक्कर लगाने लगी, जहाँ उसने खुद कभी पढ़ाई की थी। हाँ, वही स्कूल जहाँ बेंचें टूटी-फूटी थीं, पंखे थे तो सिर्फ नाम के, और छात्राओं के पास कंप्यूटर तो दूर, किताबें तक अधूरी मिलती थीं।
हाल ही में सल्तानत अचानक उसी स्कूल पहुँच गई। कोई औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, न कोई तामझाम। उस दिन वह कुछ देर क्लास में बैठी, बच्चियों से बातें की, पूछा – किताब मिलती है? पढ़ाई होती है? कंप्यूटर देखा है कभी? कई बच्चियों ने सिर हिलाया – नहीं। उनमें से एक ने कहा – "मैडम, हमें तो उसे छूना भी नहीं आता।"
बस फिर क्या था। सल्तानत ने अगले ही दिन अपने कुछ परिचितों की मदद से तीन पुराने कंप्यूटर मंगवा लिए। खुद बैठी, और छात्राओं को माउस पकड़ना सिखाया।
एक इंटरव्यू में सल्तानत ने बताया – "मैं भूलना नहीं चाहती कि उन दिनों मुझे कैसा लगता था जब पैसे न होने पर मैं कॉपी नहीं खरीद पाती थी। आज अगर मैं कुछ कर सकती हूँ, तो उन्हीं हालातों के लिए।"
उसने कहा, "बेटियाँ बड़ी जिद्दी होती हैं, बस उन्हें ज़रा सा सहारा दे दो। बाकी सब वो खुद कर लेती हैं।"
खैर, अब ये अभियान धीरे-धीरे आसपास के तीन और स्कूलों में फैल गया है। सल्तानत चाहती हैं कि ग्रामीण इलाके की हर लड़की कंप्यूटर तो कम से कम ऑनलाइन फॉर्म भरना सीख जाए।
एक स्थानीय शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया – "वो सरकारी स्कूल में आकर बच्चियों को सिखाती हैं, ऐसे में कोई फोटो निकालने की जल्दी नहीं होती। बस काम करती हैं।"
सल्तानत प्रवीण अब कुशीनगर के आसपास के कई गाँवों में जानी जाने लगी हैं। लोग उसे 'SDM मैडम' कहते हैं, पर वह खुद कहती है – "मैं तो बस सल्तानत हूँ, उसी स्कूल वाली।"
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