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चार दशक तक फ्लू से लड़ने वाली वैज्ञानिक अब नहीं रहीं, WHO ने कहा- उनकी कमी हमेशा खलेगी

चार दशक तक फ्लू से लड़ने वाली वैज्ञानिक अब नहीं रहीं, WHO ने कहा- उनकी कमी हमेशा खलेगी

चार दशक तक फ्लू से लड़ने वाली वैज्ञानिक अब नहीं रहीं, WHO ने कहा- उनकी कमी हमेशा खलेगी

नई दिल्ली। दुनिया को कई बार महामारियों से बचाने वाली एक महान वैज्ञानिक अब हमारे बीच नहीं रहीं। अमेरिका के रोग नियंत्रण केंद्र यानी CDC में सालों तक फ्लू डिवीजन की कमान संभालने वाली डॉ. नैंसी कॉक्स का निधन हो गया है। खबर मिलते ही विश्व स्वास्थ्य संगठन की उस टीम ने शोक जताया जिसे वो दशकों तक संभालती रही थीं।

"ये हम सबके लिए बहुत बड़ी क्षति है।" जिनेवा से GISRS टीम ने जो बयान जारी किया उसमें उनके इसी अंदाज की झलक थी।

जब पूरी दुनिया डर रही थी, ये रणनीति बना रही थीं

साल था 1997। हांगकांग में अचानक बर्ड फ्लू फैला। लोगों को पता भी नहीं था कि मुर्गियों से इंसानों तक पहुंचने वाला ये H5N1 वायरस कितना खतरनाक साबित हो सकता है। डॉ. कॉक्स उस वक्त CDC की टीम लीड कर रही थीं। उन्होंने बिना कोई वक्त गंवाए दुनिया भर के वैज्ञानिकों को एक मंच पर लाने का काम किया।

बारह साल बाद 2009 में जब स्वाइन फ्लू आया, तब भी लगभग यही हुआ। वो सरकारों को सलाह दे रही थीं, वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों से बात कर रही थीं और सबसे बड़ी बात - आम लोगों तक सही जानकारी पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रही थीं।

एक आइडिया जिसने पूरा खेल बदल दिया

डॉ. कॉक्स को सबसे ज्यादा याद किया जाता है GISAID नाम के एक प्लेटफॉर्म के लिए। सुनने में ये नाम थोड़ा टेक्निकल लग सकता है लेकिन कोरोना काल में आपने कई बार इसका जिक्र सुना होगा।

असल में ये एक ऐसी वेबसाइट थी जहां दुनिया भर के वैज्ञानिक फ्लू वायरस का जेनेटिक डेटा एक दूसरे से तुरंत शेयर कर सकते थे। इससे पहले तक ये आंकड़े सालों तक रिसर्च पेपर तक ही सीमित रह जाते थे। डॉ. कॉक्स ने ही इस प्लेटफॉर्म की नींव रखने में अहम भूमिका निभाई थी। बाद में कोविड के वक्त भी दुनिया को इसकी अहमियत समझ आई।

सिर्फ वैज्ञानिक नहीं, गुरु भी थीं वो

उनको करीब से जानने वाले कहते हैं कि डॉ. कॉक्स में एक अलग ही किस्म की उदारता थी। जितना वो खुद जानती थीं, उससे कहीं ज्यादा दूसरों को सिखाने में यकीन रखती थीं। CDC से लेकर WHO की लैब तक, हर जगह आज जो नई पीढ़ी के वैज्ञानिक काम कर रहे हैं उनमें से कई कभी न कभी उनके स्टूडेंट रहे हैं।

1976 में CDC जॉइन करने वाली इस महिला वैज्ञानिक ने 2014 तक यानी करीब 38 साल तक फ्लू वायरस से टक्कर ली। सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका काम खत्म नहीं हुआ था - वो अब तक युवा रिसर्चरों की मेंटर रहीं।


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New Delhi, Delhi

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