चित्रकूट : ताड़ी के गरीब बच्चों का 'डिजिटल सपना' चोरी,दो साल से FIR ठंडी, थाना मऊ की जांच पर उठे गंभीर सवाल
चित्रकूट : ताड़ी के गरीब बच्चों का 'डिजिटल सपना' चोरी,दो साल से FIR ठंडी, थाना मऊ की जांच पर उठे गंभीर सवाल
चित्रकूट। ग्राम ताड़ी के उच्च प्राथमिक विद्यालय में 13 अगस्त 2024 को हुई चोरी की कहानी अब एक ‘बंद पन्ने’ में तब्दील हो चुकी है। ‘दैनिक धमाका पत्रिका’ को इस केस से जुड़ी दस्तावेजी कार्यवाही की पूरी जानकारी मिली है, जिससे साफ है कि पुलिस ने 2025 में ही इस मामले को ‘अनट्रेस्ड’ (बिना सुराग) करार देकर फाइल को बंद कर दिया था। अब इस मामले की औपचारिक अंतिम रिपोर्ट मई माह में तहसील न्यायालय में पेश कर दी गई है।
घटना से लेकर ‘फाइलबंदी’ तक का सफर
13 अगस्त 2024 की सुबह करीब 7:30 बजे, जब स्कूल के ताले टूटे मिले और स्मार्ट प्रोजेक्टर, CPU, टैबलेट, बैटरियां, शैक्षणिक किट, दो बोरी गेहूं और छात्र उपस्थिति रजिस्टर तक गायब मिला, तो गांव में हड़कंप मच गया था। प्रधानाध्यापक मनीष कुमार वर्मा ने FIR (नंबर 0242/2024) दर्ज कराई और पुलिस ने BNS की धारा 331(4) व 305 के तहत मुकदमा दर्ज कर जांच उपनिरीक्षक ओम प्रकाश सिंह को सौंपी।
लेकिन पुलिस की यह जांच कभी मंजिल तक नहीं पहुंची। करीब एक साल तक जब कोई ठोस सुराग नहीं मिला, तो पुलिस ने 2025 में ही इस मामले को बिना किसी आरोपी की गिरफ्तारी या सामान की बरामदगी के ‘निष्प्रभावी’ (Closed) करार दे दिया।
🗣️ प्रधानाध्यापक का करारा बयान, जो पूरी कहानी बयां करता है
दैनिक धमाका पत्रिका के संवाददाता से बातचीत में प्रधानाध्यापक मनीष कुमार वर्मा ने दर्द भरे लहजे में कहा—
"अब विद्यालय प्रशासन हो या पुलिस, कोई भी इस घटना पर सक्रिय नहीं है। पुलिस ने अपना पल्ला झाड़ लिया। उन्होंने मुझसे हस्ताक्षर करवा लिए कि चोरों का कोई पता नहीं चल पाया। इस बाबत सभी दस्तावेज तो मई माह में तहसील जुडिशल (न्यायिक) में सबमिट किए जा चुके हैं। अब इस मामले में कोई उम्मीद नहीं बची।"
इस बयान से साफ झलकता है कि पुलिस ने न सिर्फ अपनी नाकामी स्वीकार की, बल्कि बिना किसी सार्वजनिक सुनवाई के, हस्ताक्षर का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गई।
‘गरीबी’ बनी इस केस की सबसे बड़ी रुकावट?
इस पूरे मामले में सबसे चुभने वाला सवाल गांव के अभिभावकों के मन में उठ रहा है। इस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के पिता खेतों में मजदूरी करते हैं, मांएं निर्माण स्थलों पर पत्थर तोड़ती हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है— "यदि यह चोरी किसी बड़े नेता या अधिकारी के बच्चों के स्कूल में हुई होती, तो क्या पुलिस इसे इतनी आसानी से ‘बिना सुराग’ बंद कर देती? क्या गरीब मजदूरों के बच्चों की शिक्षा पुलिस के लिए मामूली है?"
पुलिस की इस ‘शून्य जांच’ ने यह साबित कर दिया कि उनके लिए यह केस कभी ‘प्राथमिकता’ नहीं रहा, बल्कि एक औपचारिकता मात्र थी जिसे जल्द से जल्द टाला जाना था।
🖥️ यह सिर्फ मशीनों की चोरी नहीं, बच्चों के ‘डिजिटल हाथ’ काटे गए
पुलिस और प्रशासन की इस ‘फाइलबंदी’ का शिकार सबसे ज्यादा स्कूल के बच्चे हुए हैं। डिजिटल रूम से चोरी हुआ वह प्रोजेक्टर, वह CPU और वे टैबलेट उन बच्चों के लिए दुनिया देखने की खिड़कियां थीं।
एक अभिभावक की आंखों में नमी थी, जब उन्होंने कहा— "हम मजदूरी करके बच्चों को कंप्यूटर नहीं दिला सकते। सरकारी स्कूल ही एक सहारा था। अब जब पुलिस ने केस बंद कर दिया, तो क्या हमारा बच्चा कभी प्रैक्टिकल कंप्यूटर देख पाएगा?"
बिना प्रैक्टिकल ज्ञान के ये बच्चे डिजिटल युग की दौड़ में आउट हो जाएंगे। पुलिस की गैरजिम्मेदारी ने उनके भविष्य से खिलवाड़ किया है।
❓ ग्रामीणो के सवाल जो पुलिस को करारा जवाब देते हैं
1. चोरी का सामान गांव से बाहर कैसे गया? — पुलिस ने गांव के एक-एक व्यक्ति से पूछताछ क्यों नहीं की?
2. ‘छात्र उपस्थिति रजिस्टर’ की चोरी क्यों? — आम चोर किताबें नहीं चुराते। क्या इस रजिस्टर में कुछ छुपाने की कोशिश की गई?
3. चोरों को खाली स्कूल की सटीक जानकारी कैसे मिली? — प्रधानाध्यापक के प्रशिक्षण पर जाने की खबर किसने लीक की?
4. दो साल बाद, 2025 में ही केस बंद करने की जल्दबाजी क्यों? — क्या पुलिस ऊपर से दबाव में आकर मामला दबाना चाहती थी?
5. क्या ‘गरीब’ होना अपराध है? — अगर यह चोरी शहर के किसी निजी स्कूल में होती, तो क्या जांच का नतीजा ‘बिना सुराग’ होता?
⚖️ क्या अब उम्मीद की कोई उम्मीद की किरण बची है!
हालांकि पुलिस ने 2025 में ही मामला बंद कर दिया था और मई 2025 में इसकी रिपोर्ट कोर्ट में पेश हो चुकी है, लेकिन कानूनी तौर पर अदालत के पास पुलिस की इस ‘अनट्रेस्ड’ रिपोर्ट को खारिज कर पुनः जांच के आदेश देने का अधिकार है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या ग्रामीणों के पास इतनी ताकत है कि वे अदालत का दरवाजा खटखटा सकें?
प्रधानाध्यापक ने खुद कह दिया है कि अब कोई सक्रिय नहीं है। ऐसे में यह FIR भी उन हजारों मामलों की तरह अभिलेखागार में धूल खाएगी, जहां गरीबों के साथ न्याय का सपना अधूरा रह जाता है।
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