चित्रकूट में ग्राम पंचायतों के विकास कार्यों की होगी गहन जाँच, तीन साल का पूरा लेखा-जोखा खंगालने के निर्देश—क्या इस बार होगी असली कार्रवाई?
चित्रकूट में ग्राम पंचायतों के विकास कार्यों की होगी गहन जाँच, तीन साल का पूरा लेखा-जोखा खंगालने के निर्देश—क्या इस बार होगी असली कार्रवाई?
चित्रकूट।
जिले की ग्राम पंचायतों में पिछले तीन वर्षों में कराए गए विकास कार्यों
की अब गहराई से पड़ताल होगी। आज हुई एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक
में मुख्य विकास अधिकारी और जिला पंचायत राज अधिकारी को साफ निर्देश दिए गए
कि राज्य वित्त आयोग और 15वें वित्त आयोग से मिली धनराशि खर्च करने वाली
ग्राम पंचायतों का जनपद स्तरीय और तकनीकी अधिकारियों की संयुक्त टीम से
विस्तृत निरीक्षण कराया जाए। इस फैसले के बाद से जिले की पंचायतों में
हड़कंप की स्थिति है।
दरअसल,
राज्य वित्त आयोग और 15वें वित्त आयोग के तहत ग्राम पंचायतों को हर साल
करोड़ों रुपये की धनराशि विकास कार्यों के लिए दी जाती है। इसमें सड़क,
नाली, स्ट्रीट लाइट, साफ-सफाई, पेयजल और स्कूलों के रखरखाव जैसे काम शामिल
रहते हैं। लेकिन लगातार यह शिकायतें मिल रही थीं कि कुछ पंचायतों में या तो
काम ही नहीं हुए या फिर गुणवत्ता से समझौता किया गया। इसी को गंभीरता से
लेते हुए अब प्रशासन ने जाँच के दरवाजे खोल दिए हैं।
बैठक
में जो निर्देश जारी हुए, उसके मुताबिक जाँच टीम सिर्फ कागज नहीं देखेगी,
बल्कि ज़मीन पर उतरकर हर पहलू को खंगालेगी। प्रमुख रूप से ये बिंदु शामिल
रहेंगे:
विकास कार्यों की गुणवत्ता—जो बनाया गया, क्या वह मानकों पर खरा उतरता है?
अभिलेखों का रख-रखाव—पैसा कहाँ गया, इसका पूरा हिसाब-किताब है या नहीं?
टेंडर प्रक्रिया—काम देने में नियमों का पालन हुआ या मनमानी?
कार्यदायी संस्था और ठेकेदार की स्थिति—काम करने वाला वास्तविक है या सिर्फ नाम का?
आरआरसी (रिसोर्स रिकवरी सेंटर) और ई-रिक्शा संचालन की स्थिति।
प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में कराए गए ऑपरेशन कायाकल्प के कार्यों का सत्यापन, जो सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) और खंड विकास अधिकारी करेंगे।
प्रशासन के इस फैसले का गाँव-गाँव में स्वागत तो हो रहा है, लेकिन लोगों के मन में कुछ स्वाभाविक सवाल भी हैं। जाँच का यह आदेश अब क्यों आया? जब तीन साल से पैसा खर्च हो रहा था, तब निगरानी क्यों नहीं की गई? क्या यह जाँच सिर्फ कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगी या वाकई दोषियों पर गाज गिरेगी? जो पंचायतें इस बार निरीक्षण के दायरे में नहीं आएंगी, क्या उनकी भी जाँच होगी या सिर्फ चुनिंदा पंचायतों तक सीमित रह जाएगा? अनियमितता पाए जाने पर क्या सिर्फ सचिव और कर्मचारियों पर कार्रवाई होगी या फिर संबंधित जनप्रतिनिधियों की भूमिका की भी पड़ताल होगी? ये सवाल इसलिए अहम हैं क्योंकि पंचायतों में विकास कार्यों का खर्च सामूहिक जिम्मेदारी का विषय होता है।
बैठक में यह भी साफ कर
दिया गया कि निरीक्षण के दौरान अगर किसी भी स्तर पर अनियमितता या लापरवाही
सामने आती है तो संबंधित सचिवों और जिम्मेदार कार्मिकों के खिलाफ कड़ी से
कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। प्रशासन का यह रुख बताता है कि इस बार
मामला सिर्फ नोटिस और स्पष्टीकरण तक सीमित नहीं रहेगा।
चित्रकूट
जैसे जिले में जहाँ संसाधनों की कमी हमेशा से एक चुनौती रही है, वहाँ
वित्त आयोग की धनराशि विकास की रीढ़ मानी जाती है। अगर यही धनराशि सही
तरीके से खर्च नहीं होती तो इसका सीधा नुकसान गाँव के उस आम आदमी को उठाना
पड़ता है जिसे न सड़क मिलती है, न नाली, न स्कूलों में बच्चों के लिए बेहतर
सुविधाएँ। ऐसे में प्रशासन की यह पहल देर से ही सही, सही दिशा में उठाया
गया कदम मानी जा रही है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जाँच की यह
प्रक्रिया कितनी पारदर्शी होती है और इसके नतीजे कब तक सामने आते हैं।
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