UP पंचायत चुनाव: हाईकोर्ट ने 10 जुलाई तक माँगी तारीख, सरकार पर दबाव—क्या इस बार सच में होंगे चुनाव?
UP पंचायत चुनाव: हाईकोर्ट ने 10 जुलाई तक माँगी तारीख, सरकार पर दबाव—क्या इस बार सच में होंगे चुनाव?
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की तारीख को लेकर खिंची अड़चनें अब धीरे-धीरे खुलती नज़र आ रही हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने योगी सरकार के उस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है जिसमें ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्हें ही प्रशासक नियुक्त कर दिया गया। कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग को 10 जुलाई तक चुनाव की संभावित तारीख और ओबीसी आरक्षण आयोग की रिपोर्ट पेश करने का साफ आदेश दिया है। इसके बाद अब पूरे प्रदेश की निगाहें 10 जुलाई पर टिक गई हैं।
कहाँ से शुरू हुआ पूरा विवाद
दरअसल,
उत्तर प्रदेश के 57,694 ग्राम प्रधानों का पाँच साल का कार्यकाल 26 मई
2026 को पूरा हो गया। इसके ठीक एक दिन पहले 25 मई को राज्य सरकार ने एक
आदेश जारी कर सभी निवर्तमान प्रधानों को अधिकतम छह महीने के लिए प्रशासक
नियुक्त कर दिया। सरकार का तर्क था कि चुनाव न होने की स्थिति में पंचायतों
का रोज़मर्रा का कामकाज ठप न हो जाए, इसलिए यह अंतरिम कदम उठाना ज़रूरी
था। लेकिन यह फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती बनकर पहुँच गया।
हाईकोर्ट ने क्यों जताई नाराज़गी
जस्टिस
शेखर बी. सर्राफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने सुनवाई के दौरान
साफ कहा कि चुने हुए प्रतिनिधियों का कार्यकाल संविधान और पंचायत राज
अधिनियम के तहत केवल पाँच साल का होता है। इसे बढ़ाने का कोई प्रावधान नहीं
है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर सरकार इसी तरह बार-बार कार्यकाल बढ़ाती रही
तो चुनाव की प्रक्रिया अपनी प्रासंगिकता खो देगी। यही वजह है कि कोर्ट ने
सरकार को आड़े हाथों लिया और आयोग से सीधे चुनाव की तारीख माँग ली।
ओबीसी आरक्षण—सबसे बड़ी रुकावट
चुनाव
टलने की एक बड़ी वजह ओबीसी आरक्षण को लेकर बनी अनिश्चितता रही है। सरकार
और चुनाव आयोग का कहना था कि जब तक ओबीसी आरक्षण आयोग की रिपोर्ट नहीं आ
जाती, चुनाव कराना संभव नहीं है। लेकिन अब हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर भी
कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि आरक्षण आयोग की रिपोर्ट भी 10 जुलाई तक पेश की
जाए। इसका सीधा मतलब है कि अब सरकार और आयोग के पास चुनाव को और टालने का
कोई ठोस कारण नहीं बचा है।
10 जुलाई को सबकी नज़रें
10
जुलाई 2026 को इस मामले की अगली सुनवाई है। यह दिन कई मायनों में अहम
होगा। अगर चुनाव आयोग ने तब तक चुनाव की संभावित तारीख बता दी और ओबीसी
आरक्षण की रिपोर्ट भी आ गई, तो प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की
प्रक्रिया तेज़ी से आगे बढ़ सकती है। लेकिन अगर ऐसा नहीं होता तो हाईकोर्ट
सख्त कदम उठा सकता है। जानकारों का मानना है कि इस सुनवाई के बाद ही चुनाव
की पूरी रूपरेखा साफ हो पाएगी।
जनता के मन में उठ रहे स्वाभाविक सवाल
इस
पूरे घटनाक्रम ने आम लोगों के बीच कुछ स्वाभाविक सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर सरकार चुनाव कराने में इतनी हिचक क्यों दिखा रही है? अगर
ओबीसी आरक्षण ही रुकावट था तो रिपोर्ट इतनी देर से क्यों आ रही है? क्या सरकार द्वारा प्रधानों को प्रशासक बनाने का फैसला चुनाव को लंबा
खींचने की कोई रणनीति थी? ये सवाल सिर्फ राजनीतिक गलियारों में नहीं, बल्कि
गाँव-गाँव की चौपालों पर भी गूँज रहे हैं।
अब तक का घटनाक्रम एक नज़र में
26 मई 2026 — 57,694 ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म हुआ।
25 मई 2026 — सरकार ने सभी प्रधानों को अधिकतम 6 महीने के लिए प्रशासक नियुक्त किया।
जून 2026 — इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकार के फैसले पर आपत्ति जताई और चुनाव आयोग से तारीख माँगी।
10 जुलाई 2026 — अगली सुनवाई, तब तक चुनाव की संभावित तारीख और ओबीसी रिपोर्ट पेश करने का आदेश।
फिलहाल, उत्तर प्रदेश की पंचायतों पर प्रशासनिक नियंत्रण बना हुआ है और चुनाव का इंतज़ार कर रहे लाखों मतदाताओं के साथ-साथ संभावित उम्मीदवारों की निगाहें 10 जुलाई की तारीख पर टिकी हैं। यह एक सुनवाई तय करेगी कि प्रदेश में स्थानीय निकायों का लोकतंत्र कब ज़मीन पर लौटेगा।
अपनी राय व्यक्त करें (कमेंट्स)
पाठकों की प्रतिक्रियाएं
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। अपनी राय साझा करें!