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अनुच्छेद 4: वो छोटा सा प्रावधान जो नया राज्य बनने पर संविधान को अपने-आप बदल देता है—पूरी कहानी

अनुच्छेद 4: वो छोटा सा प्रावधान जो नया राज्य बनने पर संविधान को अपने-आप बदल देता है—पूरी कहानी

अनुच्छेद 4: वो छोटा सा प्रावधान जो नया राज्य बनने पर संविधान को अपने-आप बदल देता है—पूरी कहानी

हम सब जानते हैं कि देश में नए राज्य बनते हैं, पुराने राज्यों की सीमाएँ बदलती हैं, कभी नाम बदल जाते हैं तो कभी क्षेत्रफल घटता-बढ़ता है। इस सबके पीछे संविधान का जो सबसे बड़ा औज़ार है, वह है अनुच्छेद 3। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब संसद अनुच्छेद 3 के तहत कोई कानून बनाती है, तो आगे क्या होता है? जो पुराने कानून पहले से चल रहे हैं, उनका क्या होगा? जो नया राज्य बना है, उसे संविधान की पहली अनुसूची में जगह कैसे मिलेगी? इन्हीं तमाम सवालों का जवाब है—अनुच्छेद 4। यह छोटा सा अनुच्छेद भारतीय संविधान के सबसे व्यावहारिक और चतुर प्रावधानों में से एक है। आइए इसे पूरी तरह समझते हैं, बिना किसी जटिल कानूनी भाषा के।

अनुच्छेद 4 क्या कहता है?

अनुच्छेद 4 दो बड़ी बातें कहता है:

  1. अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत जो भी कानून बनाया जाएगा, उसमें ज़रूरी संशोधन अपने आप शामिल माने जाएँगे। यानी, अगर कोई नया राज्य बनता है तो संविधान की पहली अनुसूची (जिसमें राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के नाम और क्षेत्र लिखे हैं) और चौथी अनुसूची (राज्यसभा में सीटों का बँटवारा) में बदलाव करने के लिए अलग से संविधान संशोधन विधेयक लाने की ज़रूरत नहीं है।

  2. ऐसे किसी भी कानून को संविधान संशोधन नहीं माना जाएगा, फिर चाहे वह संविधान में संशोधन का असर ही क्यों न पैदा करे। यानी, यह साधारण बहुमत से पारित होने वाला सामान्य कानून होगा, संविधान संशोधन नहीं।

सुनने में यह छोटी सी बात लगती है, लेकिन इसका असर बहुत बड़ा है। आइए इसे एक उदाहरण से समझते हैं।

एक कहानी से समझिए अनुच्छेद 4 का जादू

मान लीजिए, संसद अनुच्छेद 3 के तहत एक कानून बनाकर उत्तर प्रदेश से अलग करके एक नया राज्य 'हरित प्रदेश' बनाती है। अब सवाल उठते हैं:

  • संविधान की पहली अनुसूची में तो 28 राज्यों की लिस्ट है। अब 29वाँ राज्य जोड़ने के लिए क्या संविधान संशोधन लाना पड़ेगा?

  • राज्यसभा में सीटों का बँटवारा चौथी अनुसूची में लिखा है। नए राज्य को सीटें देने के लिए क्या अलग से विधेयक लाना होगा?

  • अगर हर बार संविधान संशोधन करना पड़े तो क्या प्रक्रिया लंबी और जटिल नहीं हो जाएगी?

अनुच्छेद 4 इन्हीं उलझनों को सुलझाने के लिए बना है। यह कहता है कि जो कानून अनुच्छेद 2 या 3 के तहत बनाया जाएगा, उसमें यह सब बदलाव करने की ताकत खुद-ब-खुद शामिल होगी। अलग से संविधान संशोधन की ज़रूरत नहीं। यानी, 'हरित प्रदेश' बनाने वाला कानून खुद ही पहली अनुसूची में उसका नाम जोड़ देगा, चौथी अनुसूची में राज्यसभा की सीटें तय कर देगा, और ज़रूरत के हिसाब से दूसरे अनुच्छेदों में भी बदलाव कर देगा।

अनुच्छेद 4 की दो धाराएँ—बारीकी से समझिए

अनुच्छेद 4(1): कोई भी कानून जो अनुच्छेद 2 या 3 के तहत बनाया जाए, वह पहली अनुसूची और चौथी अनुसूची में संशोधन कर सकता है। इतना ही नहीं, वह कानून ऐसे 'अनुपूरक, आनुषंगिक और पारिणामिक' उपबंध भी कर सकता है जो उसे प्रभावी बनाने के लिए ज़रूरी हों। मतलब, जो भी छोटे-बड़े बदलाव उस कानून को लागू करने के लिए चाहिए, वे सब उसी कानून में किए जा सकते हैं।

अनुच्छेद 4(2): यह धारा सबसे अहम है। यह साफ कहती है कि ऐसे किसी भी कानून को अनुच्छेद 368 (जो संविधान संशोधन की प्रक्रिया बताता है) के तहत संविधान संशोधन नहीं माना जाएगा। इसका सीधा मतलब यह है कि अनुच्छेद 2 या 3 के तहत बनने वाला कानून साधारण बहुमत से पारित हो सकता है। उसे संविधान संशोधन विधेयक की तरह विशेष बहुमत (दो-तिहाई सदस्यों की उपस्थिति और बहुमत) की ज़रूरत नहीं होती।

अनुच्छेद 4 क्यों ज़रूरी है?—व्यावहारिकता का नमूना

अगर अनुच्छेद 4 न होता तो हर बार कोई नया राज्य बनाने या सीमा बदलने के लिए संसद को दो अलग-अलग काम करने पड़ते:

  • पहला, अनुच्छेद 3 के तहत एक साधारण कानून बनाकर राज्य की सीमा या नाम बदलना।

  • दूसरा, अनुच्छेद 368 के तहत एक संविधान संशोधन लाकर पहली और चौथी अनुसूची में बदलाव करना।

यह प्रक्रिया इतनी लंबी और पेचीदा हो जाती कि प्रशासनिक ज़रूरतों के हिसाब से तुरंत फैसले लेना मुश्किल हो जाता। संविधान सभा ने इस समस्या को भाँप लिया था और इसीलिए अनुच्छेद 4 को शामिल किया गया ताकि राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया सरल, तेज़ और व्यावहारिक बनी रहे।

क्या संविधान सभा में बहस हुई थी?

जी हाँ। जब संविधान सभा में इस अनुच्छेद पर चर्चा हुई तो कुछ सदस्यों ने सवाल उठाया कि जो कानून असर में संविधान का संशोधन कर रहा है, उसे संविधान संशोधन क्यों न माना जाए? उनकी दलील थी कि पहली और चौथी अनुसूची संविधान का हिस्सा हैं, और उनमें बदलाव करने वाला कोई भी कानून संविधान संशोधन ही कहलाना चाहिए।

लेकिन डॉ. बी.आर. अंबेडकर समेत संविधान निर्माताओं ने व्यावहारिकता पर ज़ोर दिया। उनका तर्क था कि अगर हर बार विशेष बहुमत की ज़रूरत पड़ेगी तो राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया राजनीतिक खींचतान का शिकार हो जाएगी। इसलिए यह तय किया गया कि अनुच्छेद 2 और 3 के तहत बनने वाले कानून साधारण बहुमत से पारित होंगे और वे खुद ही ज़रूरी अनुसूचियों में संशोधन का काम कर लेंगे।

अनुच्छेद 4 का अब तक का सफर—जब-जब हुआ इस्तेमाल

अनुच्छेद 4 का इस्तेमाल अप्रत्यक्ष रूप से हर उस मौके पर हुआ है जब अनुच्छेद 3 के तहत कोई राज्य पुनर्गठन कानून बना:

  • 1956 का राज्य पुनर्गठन अधिनियम—भाषा के आधार पर पूरे देश के राज्यों की सीमाएँ बदलीं। अनुच्छेद 4 की वजह से ही यह बिना अलग संविधान संशोधन के संभव हुआ।

  • 2000 में तीन नए राज्य—उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड बने। तीनों के गठन कानूनों ने अनुच्छेद 4 के तहत ही पहली और चौथी अनुसूची में ज़रूरी संशोधन किए।

  • 2014 में तेलंगाना—आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम ने भी अनुच्छेद 4 की शक्तियों का इस्तेमाल करके पहली अनुसूची में तेलंगाना को जोड़ा और राज्यसभा की सीटें तय कीं।

  • 2019 का जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन—अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँटने वाले कानून ने भी अनुच्छेद 4 के प्रावधानों के तहत ही ज़रूरी संशोधन किए।

इन सभी मामलों में संसद ने अलग से संविधान संशोधन विधेयक नहीं लाया। अनुच्छेद 4 की वजह से पूरी प्रक्रिया सुगम और तेज़ रही।

एक आम गलतफहमी—क्या अनुच्छेद 4 अपने आप में कोई शक्ति देता है?

बहुत से लोग समझते हैं कि अनुच्छेद 4 संसद को राज्यों की सीमाएँ बदलने की शक्ति देता है। ऐसा नहीं है। शक्ति देने वाले अनुच्छेद 2 और 3 हैं। अनुच्छेद 4 तो सिर्फ यह सुनिश्चित करता है कि उन शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए जो कानून बनाया जाए, वह बिना किसी कानूनी रुकावट के संविधान की अनुसूचियों में ज़रूरी बदलाव भी कर सके। यानी, अनुच्छेद 4 एक 'सुविधाजनक प्रावधान' है, न कि 'शक्ति देने वाला प्रावधान'।

अनुच्छेद 4 भारतीय संविधान की उस सोच का नमूना है जो कानून को व्यावहारिक बनाती है। यह सिर्फ दो छोटी धाराओं वाला अनुच्छेद है, लेकिन इसने भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के राजनीतिक नक्शे को समय-समय पर सुचारू रूप से बदलने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। अगली बार जब कोई नया राज्य बने या किसी राज्य की सीमा बदले, तो याद रखिएगा कि परदे के पीछे अनुच्छेद 4 ही वह इंजन है जो पूरी मशीनरी को बिना रुके चलाता है।


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