कुछ दिन पहले चित्रकूट की एक कोचिंग में बच्चों से बात हो रही थी। एक छात्र ने पूछा, "सर, संविधान का Article 1 आखिर इतना ज़रूरी क्यों है?" मैंने कहा, "अगर पूरे संविधान को एक घर मान लो, तो Article 1 उस घर की नींव का पत्थर है। वो पत्थर जिस पर खुदा है — ये घर किसका है, इसकी दीवारें कहाँ तक हैं और इसकी छत किस आधार पर टिकी है।"
वैसे Article 1 अभी हाल ही में फिर से सुर्खियों में आया। फरवरी 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल हुई, जिसमें 'इंडिया' नाम को हटाकर सिर्फ 'भारत' रखने की माँग की गई। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब माँगा है। 2023 में जब G20 समिट के निमंत्रण पत्र पर "President of Bharat" लिखकर भेजा गया, तब भी इसी अनुच्छेद ने ज़बरदस्त बहस छेड़ दी थी।
आज से हम एक नई सीरीज़ शुरू कर रहे हैं — 'संविधान के हर अनुच्छेद की पूरी कहानी'। और शुरुआत कर रहे हैं उसी अनुच्छेद से जिसे खुद बाबा साहेब अंबेडकर ने सबसे पहले रखा था। इस सीरीज़ को खासतौर पर SSC, UPSC और UPPSC की तैयारी करने वालों के लिए डिज़ाइन किया गया है।
Article 1 में आखिर लिखा क्या है?
भारतीय संसद की आधिकारिक वेबसाइट पर दर्ज संविधान की कॉपी के मुताबिक, Article 1 तीन हिस्सों में बँटा है।
खंड (1): "इंडिया, अर्थात् भारत, राज्यों का एक संघ होगा।" ("India, that is Bharat, shall be a Union of States.")
खंड (2): राज्य और उनके क्षेत्र वही होंगे जो पहली अनुसूची (First Schedule) में दिए गए हैं।
खंड (3): भारत के राज्यक्षेत्र में शामिल होंगे — (क) राज्यों के क्षेत्र, (ख) केंद्र शासित प्रदेश, और (ग) भविष्य में अधिग्रहित किए जाने वाले क्षेत्र।
ये तीन खंड मिलकर भारत की भौगोलिक सीमाओं और राजनीतिक पहचान को परिभाषित करते हैं। जैसे किसी इमारत की नींव में एक-एक ईंट मायने रखती है, वैसे ही ये तीनों खंड मिलकर देश के नक्शे की बुनियाद रखते हैं।
क्यों कहते हैं 'राज्यों का संघ' और 'फेडरेशन' क्यों नहीं?
बहुत से लोगों को लगता है कि भारत एक 'फेडरेशन' यानी परिसंघ है, लेकिन संविधान ने जानबूझकर 'यूनियन ऑफ स्टेट्स' शब्द चुना। डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में इसकी वजह बताई थी।
"हमारा संघ कोई समझौते का नतीजा नहीं है," अंबेडकर ने कहा। अमेरिका की तरह राज्यों ने आपसी सहमति से संघ नहीं बनाया, बल्कि संविधान लागू होते ही सारे राज्य अपने-आप इस संघ के हिस्से बन गए। और सबसे अहम बात — कोई भी राज्य इस संघ से अलग नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट ने एस. आर. बोम्मई केस में भी यही दोहराया है कि भारत एक अविभाज्य संघ है।
ये बात इसलिए ज़रूरी है क्योंकि दुनिया के कई देशों में राज्यों को अलग होने का अधिकार है, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। संविधान निर्माताओं ने जानबूझकर ये व्यवस्था रखी ताकि देश की एकता और अखंडता कभी खतरे में न पड़े।
संविधान सभा में क्या हुआ था?
17 नवंबर 1948। संविधान सभा का अहम दिन। अनुच्छेद 1 पर बहस शुरू होने वाली थी कि गोविंद बल्लभ पंत ने सुझाव दिया कि नाम पर चर्चा को फिलहाल टाल दिया जाए। सब मान गए। फिर 18 सितंबर 1949 का दिन आया। डॉ. अंबेडकर ने ड्राफ्ट आर्टिकल पेश किया — "India, that is, Bharat shall be a Union of States."
इसके बाद जो बहस हुई, वो ऐतिहासिक थी। एच. वी. कामथ ने कहा — "ये नए गणतंत्र का नामकरण संस्कार है।" सेठ गोविंद दास ने ज़ोर देकर कहा कि नाम 'भारत' ही होना चाहिए, क्योंकि आज़ादी की लड़ाई 'भारत माता की जय' के नारे से लड़ी गई। कामथ ने आयरिश संविधान का हवाला दिया जहाँ देश का नाम Eire या Ireland रखा गया था। हरगोविंद पंत ने कहा कि 'इंडिया' विदेशियों का दिया हुआ नाम है, हमें 'भारतवर्ष' ही रखना चाहिए।
के. टी. शाह ने तो यहाँ तक प्रस्ताव रख दिया कि Article 1 में लिखा जाए — "Secular, Federal, Socialist Union of States।" लेकिन डॉ. अंबेडकर ने इसका विरोध करते हुए कहा कि समाज को कैसे चलाना है, ये फैसला आने वाली पीढ़ियाँ अपने हालात के मुताबिक करेंगी, हमें उन पर अपनी सोच नहीं थोपनी चाहिए।
आखिरकार, अंबेडकर का संशोधन पास हुआ और "India, that is Bharat" वाला वाक्य संविधान का पहला अनुच्छेद बन गया।
क्या कभी बदला है ये अनुच्छेद?
हाँ, एक बार। 1956 में सातवाँ संविधान संशोधन आया, जिसने राज्यों के पुनर्गठन का रास्ता साफ किया। इस संशोधन ने खंड (2) और खंड (3)(ख) को बदल दिया। पहले राज्यों को चार श्रेणियों (Part A, B, C, D) में रखा गया था, लेकिन राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के बाद इस जटिल व्यवस्था को खत्म कर दिया गया और राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों की साफ-सुथरी सूची बनाई गई।
2019 में एक प्राइवेट मेंबर बिल भी आया था, जिसमें 'इंडिया' शब्द को पूरी तरह हटाकर सिर्फ 'भारत' करने का प्रस्ताव था। लेकिन ये बिल पास नहीं हुआ। फरवरी 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट में फिर से एक PIL दाखिल हुई, जिसमें यही माँग दोहराई गई। कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब माँगा है, लेकिन अभी तक कोई फैसला नहीं आया है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा?
Article 1 पर सुप्रीम कोर्ट के कई अहम फैसले आए हैं। 1960 का बेरुबाड़ी केस सबसे अहम है। जब सरकार पश्चिम बंगाल का कुछ इलाका पाकिस्तान को देना चाहती थी, तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी भारतीय ज़मीन को किसी दूसरे देश को देने के लिए संविधान संशोधन ज़रूरी होगा — सिर्फ संसद का कानून काफी नहीं।
इसके अलावा, पश्चिम बंगाल बनाम भारत संघ (1963) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि भारतीय राज्य अमेरिकी राज्यों की तरह संप्रभु नहीं हैं और न ही उन्हें अलग होने का अधिकार है। एन. मस्तान साहिब बनाम मुख्य आयुक्त (1962) केस में कोर्ट ने कहा कि एक बार सरकार ये घोषित कर दे कि कोई इलाका 'अधिग्रहित' कर लिया गया है, तो अदालतें उस पर सवाल नहीं उठाएँगी।
परीक्षा में पूछे जाने वाले ज़रूरी सवाल
SSC, UPSC और UPPSC के पिछले सालों के पेपर देखें तो Article 1 से ये सवाल बार-बार आते हैं:
प्रश्न 1: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1 क्या घोषित करता है?
उत्तर: "इंडिया, अर्थात् भारत, राज्यों का एक संघ होगा।"
प्रश्न 2: 'यूनियन ऑफ स्टेट्स' और 'फेडरेशन' में क्या अंतर है?
उत्तर: 'यूनियन ऑफ स्टेट्स' में राज्यों को अलग होने का अधिकार नहीं है और ये कोई समझौता नहीं है, जबकि फेडरेशन में राज्य समझौते से जुड़ते हैं और अलग भी हो सकते हैं।
प्रश्न 3: Article 1 में कौन सा संविधान संशोधन किया गया था?
उत्तर: सातवाँ संविधान संशोधन (1956), जिसने राज्यों के पुनर्गठन के लिए खंड (2) और (3)(ख) में बदलाव किया।
प्रश्न 4: बेरुबाड़ी केस (1960) का Article 1 से क्या संबंध है?
उत्तर: इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय भू-भाग को विदेशी देश को देने के लिए अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन ज़रूरी है, सिर्फ अनुच्छेद 3 के तहत संसद का कानून पर्याप्त नहीं।
प्रश्न 5: संविधान सभा में अनुच्छेद 1 पर बहस कब हुई थी?
उत्तर: 17 नवंबर 1948 और 18 सितंबर 1949।

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