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योगी सरकार की ‘कहानी’ पर हाईकोर्ट का करारा वार, आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द

योगी सरकार की ‘कहानी’ पर हाईकोर्ट का करारा वार, आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द

योगी सरकार की ‘कहानी’ पर हाईकोर्ट का करारा वार, आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द

नोएडा: 13 अप्रैल 2026 को नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में हिंसक हो गए मजदूर आंदोलन को लेकर योगी सरकार ने जो कहानी गढ़ी थी, उसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धो-डाला है। अदालत ने दिल्ली यूनिवर्सिटी की पास-आउट स्टूडेंट और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत जारी डिटेंशन ऑर्डर को "concocted story" (मनगढ़ंत कहानी) बताते हुए खारिज कर दिया है। साथ ही, कोर्ट ने जिलाधिकारी समेत जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से ₹5 लाख का मुआवज़ा आकृति को देने का आदेश दिया है।

यह फैसला एक बड़े सवाल के साथ आया है: अगर आकृति को 13 अप्रैल की हिंसा से दो दिन पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था, तो वह हिंसा भड़काने के लिए वहाँ कैसे थी?

आकृति चौधरी को उसके पिता और बचाव पक्ष के अनुसार 11 अप्रैल 2026 की शाम करीब 7 बजे नोएडा के बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से पुलिस ने हिरासत में लिया था। उनके साथ सृष्टि गुप्ता, मनीषा चौहान और रूपेश राय को भी पकड़ा गया था। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने कोर्ट में दावा किया कि आकृति को 12 अप्रैल सुबह 10:56 बजे गिरफ्तार किया गया।

हाईकोर्ट ने इस पुलिस दावे को खारिज कर दिया। कोर्ट ने पाया कि:

1. BNSS की धारा 126/130 की प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ था: कोर्ट ने पूछा कि आकृति को पहले BNSS की धारा 126 के तहत नोटिस क्यों नहीं दिया गया? राज्य ने माना कि ऐसा नोटिस नहीं दिया गया था। अदालत ने General Diary देखने के बाद कहा कि ऐसा लगता है कि पहले गिरफ्तारी हुई, उसके बाद नोटिस जारी किया गया।

2. वीडियो सबूत गायब: 1 सितंबर को कोर्ट ने UP सरकार से उस वीडियो को पेश करने को कहा, जिसमें आकृति हिंसा भड़काती दिख रही हो। सरकार ने समय मांगा, लेकिन कोर्ट ने इनकार करते हुए कहा कि आकृति पांच महीने से जेल में हैं। अगले दिन (2 सितंबर) सरकार वीडियो पेश नहीं कर पाई, जिसके बाद कोर्ट ने मुआवज़े का आदेश दिया।

3. गवाह किस बात के गवाह: कोर्ट ने सरकार से पूछा कि चार्जशीट में ऐसा कौन-सा गवाह है, जो आकृति को सीधे तौर पर जोड़ता है? जब सरकार ने गवाहों का हवाला दिया, तो कोर्ट ने सीधा वीडियो सबूत माँगा।

पुलिस की "गढ़ी" कहानी पर कोर्ट की टिप्पणी

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने कहा कि आकृति की डिटेंशन जिस 'कहानी' पर आधारित थी, वह गढ़ी/मनगढंत (concocted/fabricated) है। कोर्ट ने यह भी कहा कि NSA जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल किसी के भी खिलाफ नहीं किया जा सकता, और प्रदर्शन लोकतंत्र का अभिन्न अंग है।

आकृति की वकील टीम का कहना है कि कोर्ट ने सवाल उठाया कि प्रदर्शन में किसी की भी गिरफ्तारी नहीं हो सकती।

₹5 लाख का मुआवज़ा, क्यों?

हाईकोर्ट ने आकृति को ₹5 लाख मुआवज़ा देने का निर्देश दिया है और कहा है कि यह रकम जिम्मेदार अधिकारियों (SHO से लेकर DM तक) के वेतन से वसूली जाएगी। इस फैसले में गौतमबुद्ध नगर की DM मेधा रूपम का भी नाम शामिल है।

NSA से राहत तो मिल गई है, लेकिन आकृति अभी जेल से बाहर नहीं आई हैं। उनके खिलाफ 11 FIR हैं, जिनमें से 5 मामलों में उन्हें सेशन कोर्ट से जमानत मिल चुकी है। 6 मामलों में जमानत अभी लंबित है। इसका मतलब है कि वे कानूनी प्रक्रिया में अभी और फँसी हैं।

ये फैसला सिर्फ आकृति चौधरी के लिए राहत नहीं है, बल्कि यह योगी सरकार के उस दावे पर एक करारा तमाचा है, जो कहता था कि हिंसा के पीछे 'बाहरी ताकतों' का हाथ है। कोर्ट का कहना है कि "13 अप्रैल की हिंसा से पहले ही आकृति पुलिस हिरासत में थी। यह सवाल कि वे 13 अप्रैल को हिंसा कैसे भड़का सकती थीं, अब तक का सबसे बड़ा अनुत्तरित सवाल है।

यह मामला अब 'निर्दोष साबित' होने का नहीं, बल्कि सत्ता द्वारा NSA के दुरुपयोग को उजागर करने का है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर सरकारी मशीनरी एक 'कहानी' गढ़ सकती है, तो उसे जवाब देना होगा।

दैनिक धमाका पत्रिका ब्यूरो
दैनिक धमाका पत्रिका ब्यूरो

Lucknow, Uttar Pradesh

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