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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने का सरकारी आदेश रद्द, 13 जुलाई तक चुनाव का अल्टीमेटम

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने का सरकारी आदेश रद्द, 13 जुलाई तक चुनाव का अल्टीमेटम

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने का सरकारी आदेश रद्द, 13 जुलाई तक चुनाव का अल्टीमेटम

लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश सरकार के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसके तहत 57,694 ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें छह महीने के लिए प्रशासक नियुक्त कर दिया गया था। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने सरकार के 25-26 मई 2026 के आदेश को "प्रथम दृष्टया असंवैधानिक" करार देते हुए सरकार को 13 जुलाई तक ओबीसी आरक्षण आयोग की रिपोर्ट और पंचायत चुनाव कराने की स्पष्ट समयसीमा पेश करने का निर्देश दिया है।

दरअसल, प्रदेश की 57,694 ग्राम पंचायतों के प्रधानों का पांच साल का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो गया था। सरकार ने 25 मई को एक आदेश जारी कर सभी निवर्तमान प्रधानों को अधिकतम छह महीने के लिए प्रशासक नियुक्त कर दिया। सरकार का तर्क था कि ओबीसी आरक्षण आयोग की रिपोर्ट लंबित होने के कारण आरक्षण तय नहीं हो पाया है, जिससे चुनाव कराने में देरी हो रही है। इस आदेश को सहारनपुर निवासी अरविंद राठौर ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नंदन ने सरकार के रुख पर कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने सवाल किया, "आखिर सरकार ने प्रधानों को प्रशासक कैसे बना दिया? यह तो पहले से खंडपीठ के आदेश का उल्लंघन है।" कोर्ट ने प्रमोद लाल पटेल बनाम यूपी राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि पंचायती राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-ए) के तहत पारित आदेश पहले ही असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है। कोर्ट ने साफ कहा कि "प्रधानों को प्रशासक बने रहने की इजाजत नहीं दी जा सकती।"

ओबीसी रिपोर्ट लंबित रहने पर भी कोर्ट ने सरकार को आड़े हाथों लिया। न्यायमूर्ति ने पूछा, "सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद रिपोर्ट अब तक क्यों नहीं आई?" उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 243E और 243K का हवाला देते हुए कहा कि पंचायत का कार्यकाल पांच वर्ष निश्चित है और चुनाव समय पर होने चाहिए। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि वह 13 जुलाई 2026 से पहले एक हलफनामा दाखिल करे, जिसमें ओबीसी आयोग की रिपोर्ट और चुनाव कराने की स्पष्ट समयसीमा का उल्लेख हो। कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि अगर अगली सुनवाई तक संतोषजनक जवाब नहीं आया तो संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ेगा।
राज्य निर्वाचन आयोग ने कोर्ट को बताया कि वह चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार है। 10 जून 2026 को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित कर दी गई है, जिसमें 12 करोड़ 58 लाख से अधिक मतदाता हैं, जिनमें 1.81 करोड़ नए मतदाता शामिल हैं। आयोग का कहना है कि सरकार से आवश्यक लॉजिस्टिक सहयोग नहीं मिलने और ओबीसी रिपोर्ट के अभाव में आरक्षण तय न होने के कारण चुनाव में करीब छह महीने की और देरी हो सकती है।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, "हाईकोर्ट ने सरकार के फैसले को असंवैधानिक करार दिया है। अब सवाल यह है कि जिन्होंने यह असंवैधानिक फैसला लिया, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई होगी?" उन्होंने यह भी दावा किया कि ग्राम प्रधानों में भ्रम की स्थिति है और विकास कार्यों का खर्च प्रधानों पर डाला जा सकता है। फिलहाल, अन्य राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया का इंतजार है।

कोर्ट के इस आदेश के बाद अब प्रदेश की सभी ग्राम पंचायतों का प्रशासनिक भविष्य 13 जुलाई तक अनिश्चित हो गया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिना प्रधान या प्रशासक के पंचायतों का संचालन कैसे होगा और विकास कार्य, अनुदान व योजनाएं कैसे आगे बढ़ेंगी। कोर्ट की इस सख्ती के बाद सरकार पर समयबद्ध चुनाव कराने का दबाव काफी बढ़ गया है। अब सबकी निगाहें 13 जुलाई की सुनवाई पर टिकी हैं, जब सरकार को चुनाव की रूपरेखा पेश करनी होगी।

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दैनिक धमाका पत्रिका ब्यूरो
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Lucknow, Uttar Pradesh

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