अनुच्छेद 5: जब 26 जनवरी 1950 को करोड़ों लोगों को एक साथ मिली भारतीय नागरिकता—पूरी कहानी
अनुच्छेद 5: जब 26 जनवरी 1950 को करोड़ों लोगों को एक साथ मिली भारतीय नागरिकता—पूरी कहानी
सोचिए, साल 1947 की वो सर्द रात। आज़ादी का सूरज निकलने को है। देश बँट चुका है। आपकी जेब में कोई पासपोर्ट नहीं, कोई वोटर आईडी नहीं। सिर पर छत नहीं, क्योंकि घर उस तरफ छूट गया जो अब दूसरा मुल्क बन चुका है। रेलगाड़ी से उतरते ही एक सवाल गूँजता है—"अब मैं किस देश का हूँ?" करोड़ों लोगों की यही उलझन सुलझाने के लिए संविधान निर्माताओं ने एक अनुच्छेद लिखा। वह अनुच्छेद है—अनुच्छेद 5। आइए, इसे ठीक वैसे ही समझते हैं जैसे दादी-नानी अपने ज़माने के किस्से सुनाया करती थीं।
अनुच्छेद 5 में लिखा क्या है? तीन आसान शर्तें
26 जनवरी 1950 को जब संविधान लागू हुआ, तब अनुच्छेद 5 ने एक ही झटके में तय कर दिया कि कौन-कौन भारत का नागरिक होगा। इसके लिए तीन शर्तें रखी गईं:
भारत की धरती पर जन्म — अगर आप भारत में पैदा हुए हैं, तो बधाई हो, आप नागरिक हैं।
माँ या बाप में से कोई एक भारत में जन्मा हो — अगर आप विदेश में पैदा हुए लेकिन आपकी जड़ें यहाँ हैं, तब भी आप अपने हैं।
कम से कम पाँच साल से भारत में रह रहे हों — जो लोग 26 जनवरी 1950 से ठीक पहले से लगातार पाँच साल भारत में गुज़ार चुके थे, वे भी नागरिक बन गए।
इन तीनों शर्तों की चाबी एक ही है—'अधिवास' यानी डोमिसाइल। पहले इसे समझ लेते हैं।
'अधिवास' क्या होता है?
सीधी बात है—जहाँ आपने अपना स्थायी घर बना लिया, जहाँ आप हमेशा रहने का इरादा रखते हैं, वही आपका अधिवास है। एक मिसाल लीजिए। रमेश जी मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं, लेकिन नौकरी के सिलसिले में पिछले दो साल से कोलकाता में किराए के मकान में रह रहे हैं। तो क्या उनका अधिवास कोलकाता हो गया? नहीं। उनका अधिवास तब भी उत्तर प्रदेश ही रहेगा, क्योंकि उनका स्थायी घर वहीं है और वे वहीं लौटने का इरादा रखते हैं। ठीक इसी तरह, अनुच्छेद 5 कहता है कि नागरिकता के लिए ज़रूरी है कि व्यक्ति का अधिवास 'भारत' में हो। यानी, उसने भारत को अपना स्थायी घर बना लिया हो।
तीन शर्तों को कहानियों से समझिए
पहली शर्त: भारत में जन्म
यह
सबसे आसान शर्त है। 26 जनवरी 1950 को या उससे पहले भारत की ज़मीन पर जन्म
लेने वाला हर बच्चा नागरिक बन गया। हाँ, एक अपवाद था—अगर उसके पिता विदेशी
शत्रु हैं या राजनयिक (डिप्लोमैट) हैं, तो यह शर्त लागू नहीं होगी। लेकिन
यह बात बहुत गिने-चुने लोगों पर ही लागू हुई।
दूसरी शर्त: माँ या बाप का भारत में जन्म
यह
उन घरों के लिए था जो रोज़ी-रोटी की तलाश में विदेश गए हुए थे। मान लीजिए,
1940 में एक भारतीय दंपत्ति बर्मा (अब म्यांमार) में जाकर बस गए। वहाँ
उनके बेटे का जन्म हुआ। 1950 में जब संविधान लागू हुआ, तब वह बेटा
खुद-ब-खुद भारत का नागरिक बन गया। क्यों? क्योंकि उसके माता-पिता भारत में
जन्मे थे। इस शर्त ने उन हज़ारों प्रवासी भारतीयों को राहत दी जो वापस
लौटना चाहते थे।
तीसरी शर्त: पाँच साल का निवास
यह
शर्त सबसे ज़्यादा इस्तेमाल हुई। विभाजन के बाद पाकिस्तान से लाखों लोग
आए। कई लोग तो 1945 से पहले से ही भारत में रह रहे थे। अगर कोई व्यक्ति 26
जनवरी 1945 से लगातार भारत में रह रहा था और उसका यहीं अधिवास बन गया था,
तो वह नागरिकता का हकदार बना। यह शर्त इस बात का सबूत है कि संविधान
निर्माताओं ने विभाजन की त्रासदी को सिर्फ देखा नहीं था, बल्कि उसे महसूस
भी किया था।
अनुच्छेद 5, 6, 7 और 8—चारों भाई एक साथ
अनुच्छेद 5 अकेला नहीं है। इसके तीन और भाई हैं—अनुच्छेद 6, 7 और 8। इन चारों ने मिलकर नागरिकता की पूरी तस्वीर खींची:
अनुच्छेद 6: पाकिस्तान से आए प्रवासियों के लिए। जो 19 जुलाई 1948 से पहले आए, उन्हें तुरंत नागरिकता मिली। जो बाद में आए, उन्हें छह महीने रहने के बाद रजिस्ट्रेशन कराना पड़ा।
अनुच्छेद 7: उन लोगों के लिए जो मार्च 1947 के बाद पाकिस्तान चले गए लेकिन बाद में लौट आए। शर्त यह थी कि वापसी के बाद छह महीने भारत में बिताने होंगे।
अनुच्छेद 8: भारत के बाहर रहने वाले भारतीय मूल के लोग जो नागरिकता चाहते हैं।
इन चारों की बुनियाद अनुच्छेद 5 ही है। इसने वह पैमाना तय किया जिस पर आगे के सारे कानून बने।
अनुच्छेद 5 क्यों ज़रूरी था?
ज़रा सोचिए, अगर यह अनुच्छेद न होता तो 1950 की उस सुबह हर आदमी को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते। इसने एक ही दिन, एक ही झटके में करोड़ों लोगों को पहचान दे दी। नागरिकता के बिना न मतदान का अधिकार होता, न संपत्ति का, न नौकरी का। लोकतंत्र का पूरा ढाँचा नागरिकता पर ही टिका है। अनुच्छेद 5 उस ढाँचे की पहली ईंट है।
आगे का सफर—नागरिकता अधिनियम 1955
अनुच्छेद 5 ने सिर्फ 26 जनवरी 1950 की स्थिति साफ की। उसके बाद नागरिकता कैसे मिलेगी, कैसे खत्म होगी—यह सब तय करने की ज़िम्मेदारी संसद को दी गई। संसद ने नागरिकता अधिनियम 1955 बनाया। इसमें पाँच रास्ते खोले गए—जन्म, वंश, रजिस्ट्रेशन, देशीयकरण और भूमि सम्मिलन। 2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) भी आया, जिसने पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान और बांग्लादेश से आए गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता का विशेष रास्ता दिया। लेकिन इन सबकी जड़ अनुच्छेद 5 ही है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
अनुच्छेद 5 सीधे तौर पर बहुत विवादित नहीं रहा, लेकिन इससे जुड़े कुछ अहम मामले सुप्रीम कोर्ट पहुँचे:
इब्राहीम बनाम भारत सरकार (1965): कोर्ट ने साफ कहा कि अनुच्छेद 5 का 'अधिवास' किसी एक राज्य विशेष का नहीं, बल्कि पूरे भारत का अधिवास है। इसलिए कोई भी नागरिक देश के किसी भी कोने में जाकर बस सकता है और उसे राज्य के नाम पर नहीं रोका जा सकता।
पश्चिम बंगाल बनाम भारत सरकार (1962): इस मामले में राज्यों के अधिकार और नागरिकता के बीच के रिश्ते पर रोशनी डाली गई। कोर्ट ने कहा कि नागरिकता पूरे देश के लिए एक समान है।
अनुच्छेद 5 का स्थायी संदेश
अनुच्छेद 5 महज़ एक कानूनी धारा नहीं है। यह उस भारत की तस्वीर है जो बँटवारे के ज़ख्मों से उबर रहा था और सबको गले लगाने के लिए तैयार था। इसने कहा—तुम कहीं भी पैदा हुए हो, तुम्हारी जड़ें अगर यहाँ हैं या तुमने इस मिट्टी को अपना घर मान लिया है, तो तुम अपने हो। यही उदारता भारतीय नागरिकता की आत्मा है।
अगली बार जब आप वोट डालने जाएँ या अपना आधार कार्ड दिखाएँ, तो एक पल के लिए अनुच्छेद 5 को ज़रूर याद कीजिएगा। उसी की बदौलत हम सब 'भारतीय' कहलाते हैं।
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