22 जून का इतिहास: जब देश बचाने को गांधी-अंबेडकर ने मिलाया हाथ, और हिटलर ने रूस पर चढ़ा दी सेना
22 जून का इतिहास: जब देश बचाने को गांधी-अंबेडकर ने मिलाया हाथ, और हिटलर ने रूस पर चढ़ा दी सेना
22 जून की तारीख इतिहास के सीने में एक गहरा दाग और एक सुनहरा तमगा, दोनों लिए खड़ी है। इसी दिन एक तरफ हिंदुस्तान की सियासत ने एक बड़ा हादसा टाला, तो दूसरी तरफ दुनिया के सबसे बड़े युद्ध ने एक नया और खौफनाक मोड़ लिया। जब मुल्कों की तकदीर लिखी जा रही थी, तब एक धीमी आवाज़ मोहब्बत और ग़म के गीत गाकर करोड़ों दिलों की धड़कन बन रही थी। आइए 22 जून के उन तमाम किरदारों और घटनाओं से रूबरू होते हैं जिन्होंने दुनिया को बदल कर रख दिया।
जब हिंदुस्तान ने इतिहास रचा: वो समझौता जिसने देश को बचाए रखा
1932: पूना पैक्ट—बाबा साहेब और गांधी का वो ऐतिहासिक हाथ मिलाना
अंग्रेज़ों
ने भारत में फूट डालने के लिए 'कम्युनल अवार्ड' के तहत दलितों के लिए अलग
चुनाव क्षेत्र की व्यवस्था कर दी थी। बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर इसके
पक्ष में थे, लेकिन गांधी जी को डर था कि इससे हिंदू समाज हमेशा के लिए बँट
जाएगा। गांधी जी ने पुणे की यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। फिर 22
जून 1932 की दोपहर बाद दोनों महानायकों के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ
जिसे 'पूना पैक्ट' कहा गया। इसके तहत अलग चुनाव क्षेत्र की जगह दलितों के
लिए विधानसभाओं में आरक्षित सीटों पर सहमति बनी। यह घटना सिर्फ एक राजनीतिक
समझौता नहीं थी, बल्कि भारत को सामाजिक रूप से एकजुट रखने की बुनियाद थी।
1984: ऑपरेशन ब्लू स्टार का दर्दनाक अंत
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जून 1984 को अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में चल रहा 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' पूरे
छह दिन बाद खत्म हुआ। यह भारतीय सेना की अब तक की सबसे संवेदनशील सैन्य
कार्रवाइयों में से एक थी, जिसके गहरे ज़ख्म पंजाब और पूरे देश के दिलों पर
लगे।
जब दुनिया सुलग उठी: ऑपरेशन बारबारोसा और गैलीलियो का सरेंडर
1941: ऑपरेशन बारबारोसा—जब हिटलर ने दोस्त पर ही चला दिया हल
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जून 1941 की सुबह 30 लाख से अधिक जर्मन सैनिकों ने सोवियत संघ की सीमा पार
कर ली। इस ऑपरेशन को 'बारबारोसा' नाम दिया गया था। शुरुआत में सोवियत सेना
को भारी नुकसान उठाना पड़ा, लेकिन यहीं से दूसरे विश्व युद्ध का सबसे बड़ा
और सबसे खूनी मोर्चा खुला। आने वाले सालों में सोवियत धरती पर करोड़ों
लोगों की जान गई और अंततः यही मोर्चा हिटलर की हार की सबसे बड़ी वजह बना।
1940: फ्रांस का आत्मसमर्पण
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जून 1940 को ही फ्रांस ने नाज़ी जर्मनी के सामने घुटने टेक दिए। जर्मनी ने
वही रेल कोच मँगवाया जिसमें 1918 में उसने फ्रांस के सामने आत्मसमर्पण
किया था। यह अपमान का वो घूँट था जिसने फ्रांस को गहरी चोट पहुँचाई।
हालाँकि बाद में जनरल द गॉल ने फ्रांसीसी प्रतिरोध का झंडा बुलंद रखा।
1633: गैलीलियो ने माना विज्ञान को 'गुनाह'
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जून 1633 को वैज्ञानिक गैलीलियो गैलिली को रोम की धार्मिक अदालत के सामने
घुटने टेकने पर मजबूर किया गया। उन्हें कहना पड़ा कि पृथ्वी सूरज के चारों
तरफ घूमती है, यह बात उन्होंने गलत कही थी। कहा जाता है कि अपनी बात वापस
लेने के बाद भी उन्होंने दबी जुबान से कहा था—'एप्पुर सी मूवे'—यानी, 'फिर
भी वो (पृथ्वी) घूमती है।' यह सच पर अंधविश्वास की जीत का प्रतीक बन गया।
22 जून को जन्मीं चमकती हस्तियाँ
1931 – जगजीत सिंह: ग़ज़ल सम्राट, जिनकी आवाज़ ने हर शाम ढले 'वो कागज़ की कश्ती' और 'होठों से छू लो तुम' जैसे नग़मों से करोड़ों दिलों को छुआ। आपका बचपन याद कीजिए, जब पापा की कैसेट पर पहली बार जगजीत सिंह को सुना था—वही एहसास आज भी ज़िंदा है।
1937 – किशोरी बल्लाल: कन्नड़ और हिंदी सिनेमा की दमदार अभिनेत्री।
1947 – ओक्टेविया ई. बटलर: विज्ञान फिक्शन लिखने वाली पहली अफ्रीकी-अमेरिकी महिला, जिन्होंने अपनी कहानियों में नस्ल और पहचान के सवाल उठाए।
1953 – सिंधुताई सपकाल: 'अनाथों की माँ', जिन्होंने हजारों बेसहारा बच्चों को अपना परिवार माना। उनका जीवन संघर्ष और सेवा की जीती-जागती मिसाल है।
1964 – डैन ब्राउन: 'द विंची कोड' और 'एंजल्स एंड डीमन्स' जैसी किताबें लिखकर पूरी दुनिया को अपनी थ्रिलर कहानियों का दीवाना बनाने वाले लेखक।
प्रेमचंद के साथ एक अनकहा रिश्ता: बहुत कम लोग जानते हैं कि 22 जून 1936 को हिंदी साहित्य के कालजयी लेखक मुंशी प्रेमचंद (धनपत राय) ने प्रयाग में अपनी आखिरी कहानी 'कफन' पूरी की थी, और इसके ठीक तीन महीने बाद वे दुनिया छोड़ गए।
22 जून को हुए निधन
1932 – जेम्स व्हिटकॉम्ब रिले: अमेरिका के 'हूसियर पोएट', जो अपनी सरल और भावपूर्ण कविताओं के लिए मशहूर थे।
1969 – जूडी गारलैंड: 'द विजार्ड ऑफ ओज़' वाली हॉलीवुड आइकन, जिनका जीवन जितना चमकीला था, उतना ही दुखद भी।
1987 – फ्रेड एस्टायर: हॉलीवुड के सुनहरे दौर के सबसे बड़े डांसर और अभिनेता, जिन्होंने अपने डांस से पूरी दुनिया को थिरकना सिखाया।
2008 – सी. के. नायडू: भारत के पहले टेस्ट कप्तान और क्रिकेट के जादूगर, जिन्होंने गुलाम भारत में क्रिकेट को एक पहचान दी।
2015 – जेम्स हॉर्नर: 'टाइटैनिक' और 'अवतार' जैसी फिल्मों में बेहतरीन संगीत देने वाले ऑस्कर विजेता संगीतकार।
22 जून को मनाए जाने वाले खास दिवस
विश्व वर्षावन दिवस: यह दिन हमें धरती के फेफड़े कहे जाने वाले जंगलों को बचाने की याद दिलाता है। अमेज़न से लेकर पश्चिमी घाट तक—अगर ये जंगल नहीं बचे तो हम भी नहीं बचेंगे।
22 जून का यह सफर बताता है कि इतिहास कभी ठहरता नहीं। पूना पैक्ट की सियासत से लेकर बारबारोसा की बर्बरता तक, और गैलीलियो की मजबूरी से लेकर जगजीत सिंह की सुरीली आवाज़ तक—यह दिन हमें हर रंग दिखाता है। अगर गांधी और अंबेडकर नहीं जुड़ते, तो शायद हिंदुस्तान का नक्शा कुछ और ही होता। अगर बारबारोसा न होता, तो शायद दूसरा विश्व युद्ध का नतीजा अलग होता। और अगर जगजीत सिंह न होते, तो हमारी मोहब्बतों और तन्हाइयों का कोई हमसफर न होता।
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