बांदा : शिवानी की हत्या किसने की? एक पिता ने, या उस सोच ने जो बेटी की खुशी से बड़ी इज्जत को मानती है?
बांदा : शिवानी की हत्या किसने की? एक पिता ने, या उस सोच ने जो बेटी की खुशी से बड़ी इज्जत को मानती है?
बांदा के बदौसा थाने में शुक्रवार को जो हुआ, वह महज एक हत्या नहीं है। यह उस सोच का चेहरा है जो सदियों से हमारे समाज की छाती पर पत्थर की तरह रखी है। उन्नीस साल की शिवानी चौहान ने अपनी जिंदगी का फैसला खुद किया था। उसने अपने लिए एक साथी चुना था। लेकिन परिवार को यह मंजूर नहीं था। और जब बेटी ने थाने में खड़े होकर साफ कह दिया कि वह अपने पति के साथ ही रहेगी, तो पिता ने वहीं उसे मौत के घाट उतार दिया।
शिवानी ने 18 मई को घर छोड़ा था। अपनी मर्जी से। अपनी जिंदगी जीने। वह बालिग थी। संविधान ने उसे यह हक दिया था कि वह अपना जीवनसाथी चुन सके, अपना धर्म चुन सके, अपनी जिंदगी की दिशा तय कर सके। लेकिन समाज का लिखा संविधान अलग है। उसमें बेटियों को सिर्फ एक ही हक है—वही करो जो परिवार और बिरादरी की इज्जत के मुताबिक हो। शिवानी ने जब यह लिखित-अलिखित संविधान तोड़ा तो उसे सजा दी गई। सजा-ए-मौत।
और सबसे दहला देने वाली बात यह है कि यह सजा किसी अंधेरी गली या बंद कमरे में नहीं दी गई। यह सजा थाने के अंदर दी गई। जहां कानून का राज होना चाहिए था, जहां उसे सुरक्षित महसूस करना चाहिए था। सवाल उठता है—वहां हथियार कैसे पहुंचा? क्या थाने की सुरक्षा इतनी कमजोर थी या फिर उस पिता के मन में इतना भरोसा था कि बेटी को मारकर भी वह बच जाएगा? क्योंकि समाज उसे कातिल नहीं, बल्कि 'इज्जत बचाने वाला' कहेगा।
हम आज भी प्रेम विवाह को अपराध मानते हैं। लड़का और लड़की अगर अपनी पसंद से ब्याह कर लें तो परिवार की इज्जत मिट्टी में मिल जाती है। लेकिन जब वही परिवार का मुखिया बेटी की हत्या कर देता है, तब इज्जत बच जाती है? यह कैसी इज्जत है जो एक लाश पर खड़ी होती है? यह कैसी प्रतिष्ठा है जो बेटी के खून से सींची जाती है?
यह सिर्फ बांदा की कहानी नहीं है। यह हर उस घर की कहानी है जहां बेटी की खुशी से बड़ी बिरादरी की नजर है। हर उस समाज की कहानी है जो बेटियों को अपनी संपत्ति समझता है। जब तक यह सोच जिंदा है, तब तक थाने, कोर्ट और कानून सब बेमानी हैं। क्योंकि अगर बेटी को अपना फैसला लेने की आजादी नहीं, तो फिर यह देश उसे क्या दे रहा है?
शिवानी की मां ने पिता के खिलाफ ही रिपोर्ट दर्ज कराई है। यह मां का दर्द है, जिसने बेटी को खोया भी और अब पति को भी खो चुकी है। लेकिन इस दर्द के बीच उसने जो साहस दिखाया, वह बताता है कि बदलाव की शुरुआत घरों से ही होगी।
शिवानी अब नहीं है। लेकिन उसकी कहानी एक आईना है। उस आईने में हमें अपना चेहरा देखना चाहिए—क्या हम उस समाज का हिस्सा हैं जो बेटियों को पंख देता है या उस समाज का जो पंख काटता है? जवाब हर किसी को खुद देना होगा। लेकिन इतना तय है कि शिवानी की मौत पर सिर्फ आंसू बहाकर हम अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। हमें बदलना होगा। वरना यह 'इज्जत' का भूत हर घर की बेटी को निगलता रहेगा।
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